भोपाल

आपको मोटिवेट करेंगी इन दिव्यांगो के स्ट्रगल की कहानी

कटे हुए पैर को हथियार बनाकर बनी माउंटेनियर मन से स्ट्रॉन्ग हैं तो दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहींदुनिया की सात सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने वाली पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा

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Mar 08, 2019
InternationalWomensDay

भोपाल. इंस्पायर इंडिया अवॉर्ड समारोह में शिरकत करने आईं एवरेस्ट शिखर पर चढऩे वाली पहली भारतीय दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा ने पत्रिका को हॉल में दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में शामिल अंटार्कटिका के विन्सन मैसिफ पर तिरंगा फहराने के अभियान में होने वाली चुनौतियों पर चर्चा करते हुए बताया कि मुझे अपने अभियान को समिट करने में कई परेशानियों का सामना करना था।

यह पीक समुद्र तल से लगभग 5 किमी का है और 800 मीटर का स्टीप है, इसमें मुझे 17 घंटे लगे थे। यहां ऑक्सीजन नहीं थी और न ही विंड। मुझे रोप के सहारे आइस वाल से बार-बार टकराकर गुजरना पड़ा था। उन्होंने बताया कि एक पल ऐसा आया था कि मुझे मेरे गाइट ने पीक समिट करने से मना कर दिया था। गाइड स्कॉट उलेन गाइट ने मुझे कहा अरुणिमा 'डू यू वॉन्ट टू गो बैक...Ó यह शब्द सुनकर मैं एक सेकंड रूकी फिर कहा, नो...आई वॉन्ट टू गो अप... इसके बाद मैंने अपने अभियान को पूरा किया।

2011 में गुंडो से फेंका था ट्रेन से
राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी रहीं अरुणिमा सिन्हा को साल 2011 में कुछ गुंडों ने चलती ट्रेन से फेंक दिया था। असहनीय पीड़ा में पूरी रात रेलवे ट्रैक पर गुजारने वाली अरुणिमा को इस घटना में अपना एक पैर गंवाना पड़ा और उनके दूसरे पैर में रॉड लगाई गई। महज दो साल के अंदर दुनिया की सबसे ऊंची जगह माउंट एवरेस्ट फतह कर पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही बनने का खिताब अपने नाम कर लिया।


एक पैर के सहारे दुनिया की पर्वत चोटिंयों को छुआ
पद्मश्री पुरस्कार से नवाजी गई 30 वर्षीय अरुणिमा अभी तक एक पैर के सहारे दुनिया की 7 प्रमुख पर्वत चोटियों पर तिरंगा लहराकर विश्व कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं। उन्होंने बताया कि 2011 की घटना के बाद मैंने शांत होकर सोचा और कुछ करने का फैसला लिया। मैंने अपने आप से चैलेंज लिया और अपने कटे हुए पैर को हथियार बनाया। कुछ समय तक रोई फिर मुझे सैल्युशन मिला कि मुझे पर्वतारोही बनना है। उन्होंने बताया कि दिव्यांगता शरीर से नहीं मन से होती है। अगर व्यक्ति मन से स्ट्रॉन्ग है तो दुनिया को कोई भी कठिन काम कर सकता है।

9 साल की उम्र में तैराकी सीखी, टीचर ने कहा था कि छोडऩा मत पैरा स्पोट्र्स में भी करियर है

पीटी उषा का सर्वाधिक पदक जीतने का रिकॉर्ड तोडऩे वाले पैरा तैराक शरथ गायकवाड़
भोपाल इंचियोन पैरालिंपिक एशियाड में 6 पदक जीतकर पीटी उषा का सर्वाधिक पदक जीतने का रेकॉर्ड तोडऩे वाले पैरा तैराक शरथ गायकवाड़ ने बताया कि जब मैं 9 साल का था, तब स्कूल में टीचर ने तैराकी करने को कहा था। उन्होंने कहा था कि तैराकी सीखकर छोड़ मत देना क्योंकि पैरा स्पोट्र्स भी होता है जिसमें आप अच्छा कर सकते हो। फिर मैंने सीरियसली ट्रेनिंग लेना शुरू किया। 2003 में पहला नेशनल मेडल जीता। फिर यहां से मैंने तैराकी में भविष्य बनाने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि अभी मैं पिछले पांच सालों से बेंगलुरु में तैराकी की नए पौध को निकालने के लिए नई जनरेशन को तैराकी सीखा रहा हूं। यहां से अभी तक कई स्टेट और नेशनल खिलाड़ी निकल चुके हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल एशियन पेरा गेम्स में स्वप्निल पाटिल ने तीन पदक जीते थे और सुनील नंदकुमार ने चौथा स्थान हासिल किया था।

पैरा गेम्स में सरकार करे मदद
दिव्यांगों के लिए पहले कुछ नहीं था लेकिन आज उनके लिए बहुत कुछ है। वह कुछ भी कर सकते हैं। पैरा गेम्स के लिए सरकार को और काम करने की जरूरत है। पहले देश को पैरा एशियन गेम्स और ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में क्वालीफाई करना भी मुश्किल होता था लेकिन आज खिलाड़ी देश के पदक जीत रहे हैं। इसलिए खिलाडिय़ों को और टे्रनिंग फैसिलिटी और स्पॉन्सरशिप देने की जरूरत है।
जागरूकता से लोग पहचानने लगे हैं
उन्होंने बताया कि लोग जागरूक हो रहे हैं। समाज में लोग दिव्यांग खिलाडिय़ों को एक सामान्य खिलाड़ी के बराबर ही सम्मान देने लगे हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में मैंने जब तैराकी शुरू की थी तब मेरे माता-पिता घबराते थे। वे मुझे तैराकी करने के लिए मना करते थे। शरीर का डेवलपमेंट होने लगा तो उन्होंने मेरा सहयोग किया। 2020 टोक्यो ओलंपिक में भारत की उम्मीदों पर बताया कि रियो ओलंपिक में हमें चार पदक मिले थे लेकिन इस बार पदकों की संख्या बढ़ेगी। कई एथलीट्स अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।

Published on:
08 Mar 2019 10:15 am
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