Bijapur Bulldozer Action: नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में नगर पालिका की कार्रवाई ने एक बार फिर मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक फैसलों को आमने-सामने ला खड़ा किया है।
Bijapur Bulldozer Action: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में नगर पालिका की कार्रवाई ने एक बार फिर मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक फैसलों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। नक्सल हिंसा से जान बचाकर शहर पहुंचे दर्जनों परिवारों के आशियाने एक झटके में उजड़ गए। नया बस स्टैंड के पीछे चट्टानपारा इलाके में 55 मकानों पर बुलडोजर चला, जिससे कई परिवार खुले आसमान के नीचे आ गए। इन मकानों में डीआरजी जवानों के परिजन और नक्सल पीड़ित परिवार भी शामिल थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, ये परिवार वर्षों पहले अपने गांव इसलिए छोड़कर आए थे क्योंकि वहां नक्सल हिंसा के चलते जान का खतरा बना हुआ था। शहर में झोपड़ी और कच्चे मकान बनाकर किसी तरह जीवनयापन कर रहे थे, लेकिन अब वही ठिकाना भी उनसे छिन गया।
कार्रवाई के दौरान मौके पर मौजूद महिलाओं और बच्चों की आंखों में डर और असहायता साफ नजर आई। एक महिला ने बताया कि उसका पति डीआरजी में तैनात है और ऑपरेशन पर गया हुआ है, घर तोड़ दिया गया और बच्चे भूखे बैठे हैं। कई परिवारों ने कहा कि गांव लौटना आज भी जानलेवा है, जबकि शहर में अब उनके पास सिर छुपाने की कोई जगह नहीं बची।
नगर पालिका प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई अचानक नहीं की गई। अधिकारियों के अनुसार, पिछले दो वर्षों से लगातार नोटिस दिए जा रहे थे। 22 दिसंबर को अंतिम नोटिस जारी कर अतिक्रमण हटाने की चेतावनी दी गई थी। प्रशासन का दावा है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ही कार्रवाई की गई है।
नगर पालिका के अनुसार, यह कार्रवाई यहीं नहीं रुकेगी। दूसरे चरण में शांतिनगर इलाके के करीब 20 मकानों पर भी बुलडोजर चलाने की तैयारी है। इससे और परिवारों के बेघर होने की आशंका जताई जा रही है।
कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि नक्सल हिंसा से प्रभावित और सुरक्षा बलों के साथ खड़े परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी किसकी है? स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ मानवीय विकल्प और पुनर्वास की ठोस व्यवस्था भी जरूरी है।
बीजापुर की यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रही है कि कानून के पालन और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? नक्सल प्रभावित इलाकों में जहां सुरक्षा और पुनर्वास दोनों ही चुनौती हैं, वहां बिना वैकल्पिक व्यवस्था के की गई ऐसी कार्रवाई समाज के सबसे कमजोर वर्ग को और हाशिये पर धकेलने का काम कर रही है।