
दिनेश स्वामी/भैराराम तर्ड। जिस लाल पत्थर से बनी बीकाणा की एक हजार हवेलियों और जूनागढ़ किले की दुनिया कायल है, वह अपनों की अनदेखी का शिकार है। बीकानेर से 65 किलोमीटर दूर दुलमेरा की खदानों से निकलने वाले लाल पत्थर इन इमारतों की जान हैं। विश्व प्रसिद्ध रामपुरिया हवेली में इस पत्थर पर की नक्काशी सवा सौ साल बाद आज भी ज्यों की त्यों है। अब लाल पत्थर की इन अधिकांश खदानों में सन्नाटा पसरा है। इनमें चंद मजदूर ही पत्थर पर हथौड़ा चलाते दिखते हैं।
गांव दुलमेरा की खदानों से निकलने वाले लाल पत्थर को स्थानीय भाषा में ‘माखणिया भाटा’ भी कहा जाता है। यह लाल बलुआ पत्थर इमारतों के निर्माण और बारीक और कलात्मक चित्रण के लिए बहुत उपयोगी है। रियासतकाल में इस पत्थर की सात समुंदर पार तक मांग रहती थी। बीकानेर का जूनागढ़ किला हो या फिर गजनेर पैलेस, रामपुरिया हवेली, लालगढ़ पैलेस, लक्ष्मी निवास। अनगिनत पर्यटकों के आकर्षण वाले भवन इसी दुलमेरा के लाल पत्थर से बने हैं। इसी की बदौलत बीकानेर को हैरिटेज सिटी के रूप में पहचान मिली है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने हवेलियों को संरक्षित घोषित कर रखा है। परन्तु जिस लाल पत्थर से इनके झरोखे और जालियां बनीं, उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा।
पानी का प्रहार बेअसर, सालों बाद भी चमक बरकरार
लूणकरनसर तहसील की हंसेरा ग्राम पंचायत से 4 किलोमीटर के फासले पर दुलमेरा गांव में प्रचूर मात्रा में लाल बलुआ पत्थर है। इसकी खासियत यह है कि इस पर तेज धूप और बारिश के पानी के प्रहार का असर नहीं होता है। सालों बाद भी इसकी चमक खराब नहीं होती।
बीकानेर की हवेलियों में झरोखों, दरवाजों, छज्जों, चबूतरों पर दिखने वाली बारीक व जटिल छिद्रित नक्काशी भी इस लाल पत्थर पर ही संभव है। कारीगर बताते हैं कि नरम होने से इस पत्थर पर बारीक नक्काशी संभव है। कारीगर कंगूरे झरोखे-जालियां, छतरियां बनाने में इस पत्थर को पसंद करते रहे हैं। पहले तो कारीगर इससे आईने का फ्रेम, प्याले-कटोरे, हुक्के, कुंडियां तक बनाते थे।
विलायत तक चर्चे
आजादी से पहले बहावलपुर (पाकिस्तान) में एक दरगाह के निर्माण में इस पत्थर का उपयोग किया गया था। यूरोप के कई देशों में इस लाल पत्थर से बने लैमो पोस्ट, जाली, झरोखों की मांग आज भी है। भिवानी आदि शहरों में इस पत्थर की मूर्तियां गढी जाती हैं।
21वीं सदी में हथौड़े से खनन
वर्तमान में दुलमेरा में करीब 25 खदानें पंजीकृत हैं। इनमें से 8-10 ही चल रही हैं। इनमें भी तीन-चार खदानों में कम्प्रेसर मशीनों से काम होता है। शेष खानों में मजदूर-घण व हथौड़े से पत्थर चीरकर निकालते हैं। खानों में श्रमिक भी परंपरागत औजारों के भरोसे काम करते हैं। कोटा-निंबाहेड़ा भीलवाड़ा में मशीनों के उपयोग और वहां के पत्थर की बेहतर मार्केटिंग और सरकारी प्रोत्साहन से दुलमेरा का अच्छी गुणवत्ता का होने के बावजूद यह पत्थर बाजार में पिछड़ गया है।
150 फीट गहरी खान
यहां सबसे गहरी खान आसाराम सुथार की है, जो करीब 150 फीट गहरी है। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी खान श्रमिक दो जून की रोटी मुश्किल से जुटा पाते हैं। खान मालिक पंजीकरण, रॉयल्टी, बिक्रीकर, मजदूरी एवं अन्य खर्चों को वहन करने के बाद बहुत कम कमा पाते हैं। यही वजह है कि खान मालिकों की अगली पीढ़ी का अपने परंपरागत व्यवसाय से मोहभंग हो रहा है। खान मालिक आसाराम सुथार ने बताया कि एक समय था, जब इस पत्थर के सितारे बुलंद थे। मगर सरकारी अनदेखी के चलते अब दुलमेरा की खदानें गुमनामी के अंधेरे में खो रही हैं।
रॉयल्टी वसूलने तक सीमित
राज्य सरकार का खान विभाग केवल रॉयल्टी वसूलने व सालाना लाइसेंस फीस लेने के सिवा इस पत्थर के कारोबार को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कर रहा। दुलमेरा की खानों में पड़े पत्थर की रेट 45 से 50 रुपए प्रति वर्ग फीट है। दुलमेरा से बीकानेर के लिए ट्रक माल भाड़ा 70 से 75 रुपए प्रति क्विंटल है। खान विभाग की ओर से टैक्स भी वसूला जाता है। सरकारी कार्यों में इस पत्थर का उपयोग नहीं होने तथा महंगे माल भाड़े के कारण से भी माखणियें भाटे की कदर घट रही है।