रावी-व्यास जल विवाद को लेकर गठित ट्रिब्यूनल ने देखा रिजर्व वायर। पंजाब-हरियाणा के साथ जल विवाद के निपटारे के लिए गठित है ट्रिब्यूनल। तीनों राज्यों के मुख्य अभियंता, एएजी सहित कई अधिकारी साथ में राजस्थान आए हुए है।
बीकानेर. रावी-व्यास के पानी में प्रदेश के हिस्से को लेकर चल रहे विवाद का निस्तारण करने के लिए गठित ट्रिब्यूनल अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है। इसी सिलसिले में ट्रिब्यूनल का दल दो दिन से राजस्थान के दौरे पर है। यह दल 8 मार्च तक प्रदेश में रहेगा।
दल के अध्यक्ष व सदस्य इंदिरा गांधी नहर परियोजना की आरडी 507 पर पहुंचे। उन्होंने यहां बने रिजर्व वायर को देखा और नहर में पहुंच रहे पानी की मात्रा की रिपोर्ट ली। दल में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के सिंचाई विभाग मुख्य अभियंता, एएजी तथा सरकार के प्रतिनिधि शामिल है। ट्रिब्यूनल के सक्रिय होने से चार दशक से अपने हिस्से के 0.60 एमएएफ नहरी पानी से वंचित राजस्थान को पूरा हिस्सा मिलने की उम्मीद बंधी है।
पांच सदस्यीय दल ने गुरुवार को राजस्थान क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र का दौरा शुरू किया है। इसके फर्स्ट और सैकेंड फेज का निरीक्षण किया गया। यह रावी-व्यास नदी से मिल रहे नहरी पानी की पहुंच के अंतिम छोर तक के एरिया का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार करेंगे। इससे पहले पंजाब क्षेत्र का दौरा कर चुके है। सूत्रों के मुताबिक ट्रिब्यूनल रिपोर्ट तैयार कर केन्द्र सरकार को सौंपेगा। इसके आधार पर तीनों राज्यों के बीच नदियों के जल में हिस्से को लेकर सालों से चल रहे विवाद का निपटारा करने का प्रयास किया जाएगा।
अंतरराज्यीय नदी जल विवाद को लेकर गठित इस ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनीत सरन है। न्यायाधीश सुमन श्याम व न्यायाधीश नवीन राव भी साथ है। राजस्थान दौरे के दौरान आइजीएनपी के मुख्य अभियंता, अतिरिक्त मुख्य अभियंता सहित कई अधिकारी साथ रहे। ट्रिब्यूनल का लंबे समय बाद राजस्थान की भौगोलिक स्थिति को लेकर दौरा करने आया है।
राजस्थान दौरे के दौरान बीकानेर से जैसलमेर तक यह ट्रिब्यूनल जमीनी हकीकत की पड़ताल करेगा। इस दौरान जल उपयोगिता संगम के अध्यक्षों और किसानों से भी बातचीत कर सकते है। साथ ही सिंचित क्षेत्र, पेयजल की आवश्यकता और आपूर्ति सहित अन्य पहलुओं को भी देखा जाएगा।
रावी-व्यास नदियों के अधिशेष पानी का पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के बीच 31 दिसम्बर 1981 को समझौता हुआ था। इसके तहत राजस्थान को 8.60 एमएएफ पानी देना तय हुआ। उस समय इंदिरा गांधी नहर का सिंचाई तंत्र पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। ऐसे में पंजाब ने 8.00 एमएएफ पानी ही राजस्थान को दिया। शेष 0.60 एमएएफ पानी सिंचाई तंत्र विकसित होने पर देने का वादा किया। आइजीएनपी का प्रथम व द्वितीय चरण में सिंचाई तंत्र विकसित हुए कई दशक हो गए है। राजस्थान लगातार अपने हिस्से का शेष पानी मांग रहा है लेकिन पंजाब नहीं दे रहा। इसी को सुलझाने के लिए यह ट्रिब्यूनल बनाया गया है।
न्यायाधिकरण का गठन मूल रूप से 2 अप्रेल, 1986 को किया गया। इसने 30 जनवरी 1987 को केंद्र सरकार को प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। केंद्र सरकार ने अतिरिक्त संदर्भ और स्पष्टीकरण मांगे। इसके बाद से करीब चार दशक से प्रक्रिया चल रही है। अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 के तहत गठित इस न्यायाधिकरण को पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों हरियाणा व राजस्थान के बीच जल वितरण का निपटारा करने का कार्य सौंपा हुआ है।