पीबीएम अस्पताल के डेंटल विभाग ने देश आजाद होने से पहले दुनिया में चलन में आई डेंटल चेयर को कबाड़ से निकाल कर पुन: उपयोग में लेने के लिए तैयार करवाया है। हालांकि यह चेयर 1955 के दंत विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है।
सालों पुरानी कबाड़ में फेंके गए सामान का भी मरम्मत कर उपयोग किया जा सकता है। चिकित्सकीय उपकरणों में डेंटल चेयर (कुर्सी) का ऐसा ही ‘ओल्ड इज गोल्ड’ का उदाहरण बीकानेर में सामने आया है। पीबीएम अस्पताल के डेंटल विभाग ने देश आजाद होने से पहले दुनिया में चलन में आई डेंटल चेयर को कबाड़ से निकाल कर पुन: उपयोग में लेने के लिए तैयार करवाया है। हालांकि यह चेयर 1955 के दंत विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है। इस समय तक आधुनिक डेंटल चेयर भारत में विदेशों से मंगवाई जाती थी। दन्त रोग विभाग में साफ-सफाई के दौरान कुछ दिन पहले विभागाध्यक्ष डॉ. रंजन माथुर की नजर कबाड़ में पड़ी डेंटल चेयर पर पड़ी। उन्होंने कुर्सी को कंडम घोषित नहीं कर उपयोग में लेने का मन बनाया। विभागीय प्रक्रिया में इस तरह पुराने उपकरण पर पैसा खर्च करने की पैचीदा प्रक्रिया है। ऐसे में डॉ. माथुर ने इस एंटिक आइटम रूपी कुर्सी की मरम्मत अपनी जेब से करवाने का निर्णय किया। उन्होंने कुर्सी की मरम्मत पर 8 हजार रुपए खर्च किए और अब आधुनिक डेंटल चेयर्स के बीच अपनी वापसी कर चुकी है। खासकर बिजली नहीं होने के दौरान जहां इलेक्ट्रोनिक्स ऑपरेटिव चेयर काम नहीं करती। यह हाईड्रो पम्प लगी मैनुअल चेयर होने से मरीज के दांतों का उपचार करने के लिए काम आ जाती है।
यह है डेंटल चेयर का इतिहास
दुनिया में सबसे पहली डेंटल चेयर अमेरिकी दंत चिकित्सक जासिया फ्लेग ने तैयार की थी। वर्ष 1790 में विंडसन राइटिंग चेयर को संशोधित कर लोहे से निर्मित चेयर बनी। इसमें गद्देदार सीट, बैक रेस्ट व हैड रेस्ट शामिल किए गए। उपकरण रखने के लिए एक ट्रे भी लगाई गई। वर्ष 1832 में लंदन के दन्त चिकित्सक जैम्स स्नेल ने इसे बनाया था। वर्ष 1877 में बेसिल विमिलेनी निल्कशन ने हाइड्रोलिक चेयर तैयार की। इसके बाद डॉ. जॉन लाइटन ने ऐसी डेंटल चेयर बनाई जिस पर मरीज को लेटाकर दांतों का इलाज किया जा सके।
1955 के रजिस्टर में मिला कुर्सी का उल्लेख
यह कुर्सी आधुनिक डेंटल चेयर की तरह नहीं है। फिर भी इसमें कई ऐसी विशेषता है जो मरीज एवं चिकित्सक दोनों के लिए उपयोगी है। कुर्सी में मरीज की सुविधा के अनुसार ऊपर-नीचे करने के लिए हाईड्रोलिक पम्प लगा हुआ है। दांतों का उपचार करते समय मरीज की गर्दन व्यविस्थत रखने के लिए बोन सपोर्ट है। बैक रेस्ट लगा हुआ है जिसे आगे-पीछे किया जा सकता है। हैड रेस्ट एवं सीट है। इसे 360 डिग्री तक घुमाया जा सकता है।
उपयोगी है पुरानी डेंटल चेयर
कबाड़ में पड़ी चेयर को कंडम घोषित नहीं कर मरीजों के काम आने के लिए तैयार कराई है। मरीजों के काम आ सके, इसके लिए अपने पास से आठ हजार रुपए भी खर्च किए है। यह महत्वपूर्ण है कि मरीज का दांत निकालने के दौरान गर्दन नहीं हिलती है। इसके लिए बैक सपोर्ट भी लगा हुआ है।
- डॉ. रंजन माथुर, विभागाध्यक्ष दंत विभाग पीबीएम अस्पताल बीकानेर