CG News: बिलासपुर जिले में 2018 के कांग्रेस शासनकाल के बाद अब भाजपा सरकार में भी बिलासपुर की उपेक्षा हुई है। बिलासपुर एक बार फिर मंत्रिविहीन है।
CG News: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में 2018 के कांग्रेस शासनकाल के बाद अब भाजपा सरकार में भी बिलासपुर की उपेक्षा हुई है। बिलासपुर एक बार फिर मंत्रिविहीन है। मध्यप्रदेश के दौरान भी बिलासपुर इस तरह उपेक्षित और सरकार में प्रतिनिधित्व विहीन नहीं रहा।
प्रदेश के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सोशल मीडिया, स्थानीय नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं सहित जनता में भी यह चर्चा का विषय है कि भाजपा भी बिलासपुर के मामले में पिछली कांग्रेस सरकार की राह पर है। पिछली सरकार ने पहली बार चुने विधायकों को मंत्री पद न देने के नाम पर बिलासपुर को 5 साल उपेक्षित रखा।
प्रतिनिधित्व न मिलने और आपसी खींचतान में शहर का विकास बाधित हुआ। वर्तमान भाजपा सरकार में भी यही स्थिति दिख रही है। बल्कि पुराने अनुभवी नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी महत्व नहीं मिल रहा है। हालत बिलासपुर से मंत्री न बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र की समस्याओं और मूलभूत जरूरतों के प्रति भी प्रदेश नेतृत्व का ठंडा रुख जनता को परेशान कर रहा है।
यह भी चर्चा है कि सरकार का कद बरकरार रखने के लिए अनुभवी नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है। वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल को दिल्ली शिट करना हो या वर्तमान विस्तार से वरिष्ठ भाजपा नेता राजेश मूणत, अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, धरमलाल कौशिक को बाहर रखना, इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी से जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया है कि इससे न सिर्फ पार्टी के अंदर असंतोष है, बल्कि बिलासपुर के विकास और प्रशासनिक कसावट पर भी असर पड़ेगा।
मध्यप्रदेश के दौर में भी बिलासपुर यहां के नेताओं और प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चित रहा है। श्रीधर मिश्रा, चित्रकांत जायसवाल, बीआर यादव, राजेंद्र प्रसाद शुक्ला, अशोक राव जैसे कद्दावर विधायकों ने अपने काम के दम पर जनता और सरकार के बीच ऐसी छाप छोड़ी, जिसकी आज भी चर्चा होती है। छत्तीसगढ़ के पहले मुयमंत्री अजीत जोगी के दौर में बिलासपुर जिले का दबदबा रहा और काम भी तेजी से हुए।
सत्ता हो या फिर संगठन, बिलासपुर जिले का स्थान अग्रणी और चर्चित ही रहा। वर्ष 2008 में जब पहली बार भाजपा की सरकार बनी तब से लेकर वर्ष 2013 तक मुयमंत्री डॉ. रमन सिंह के दौर में भी बिलासपुर का सियासी रसूख कायम रहा। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद लगभग 15 साल तक नेतृत्व के मामले में सक्षम और अग्रणी बिलासपुर लगातार दूसरी बार हाशिए पर है।