जैविक उर्वरकों का उपयोग कर जैविक खेती की तरफ बढ़ रहे किसान, रासायनिक उर्वरक से सस्ते जैविक उर्वरक
बिलासपुर - आर्गेनिक खाद्य पदार्थ के बढ़ते डिमांड के साथ, आर्गेनिक फार्मिंग करने वाले किसानों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। जिसके चलते किसानो के बीच जैव उर्वरक के इस्तमाल में भी तेजी आई है। फसलों की ग्रोथ में नाइट्रोजन एहम भूमिका निभाता है। बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय के मृदा वैज्ञानिक डॉ प्रमेन्द्र केशरी बताते हैं कि नाइट्रोजन फिक्सिंग जैव उर्वरक की सहायता से प्रति एकड़ उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है। नाइट्रोजन फिक्सिंग जैव उर्वरक सूक्ष्मजीवों से बने होते हैं जो वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन को पौधे के उपयोग किए जाने की स्थिति में परिवर्तित करते हैं। कोटा रोड स्थित ग्राम चोरभट्टी में बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र, राज्य जैव नियंत्रण प्रयोगशाला में जैविक उर्वरक और नील हरित शैवाल का उत्पादन किया जा रहा है। यहां बनाए जा रहे जैव उर्वरक से अब तक 22 हज़ार से अधिक किसान लाभान्वित हो चुके हैं। इन किसानों द्वारा हज़ारों हेक्टेयर में इसका उपयोग किया जा चुका है।
खेती में पैदावार को बढ़ावा देने में एन(नाइट्रोजन), पी(फॉस्पोरस), के(पोटासियम) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैविक खाद इन गुणों से भरपूर होती है वहीं ये रासायनिक उर्वरक के मुकाबले सस्ती भी होती है। जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरकों के पूरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। ये रासायनिक उर्वरक की तुलना में काफी सस्ते होते हैं। जैव उर्वरक का इस्तमाल रबी, खरीफ, दलहन और तिलहन सभी तरह के फसलों के लिए किया जा सकता है। वहीं जैव उर्वरक के उपयोग से 10 से 20 फीसदी तक प्रति एकड़ उत्पादन बाध्य जा सकता है। जैव उर्वरक मृदा के लिए एंटीबायोटिक दवा के रूप में भी काम करता है जिससे फसलों में मिट्टी जनित रोग को नियंत्रण किया जा सकता है ।
बढ़ी जागरूकता, बढ़ रहे जैव उर्वरक इस्तेमाल करने वाले किसान
डॉ केशरी बताते हैं कि किसानों के बीच तेजी से इसका उपयोग बढ़ रहा है। हर साल सैकड़ों किसानों को अनुसन्धान केंद्र बुला कर उन्हें जैव उर्वरक के उपयोग की ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग लेने पहुंच रहे किसानों का कन्वर्शन रेट भी अच्छा है। ट्रेनिंग लेने पहुंच रहे हर 100 किसानों में से करीब 20 से 25 प्रतिशत किसान जैव उर्वरक का रुख करते हैं। वहीं जिन किसानों ने जैव उर्वरक का उपयोग एक बार कर लिया है वो दोबारा से जैव उर्वरक की तरफ रुख करते हैं।
सूक्ष्मजीवों को पनपने में करता है मदद
जैसा की हम जानते हैं कि फसलों की पैदावार और मिटटी की सेहत के लिए सूक्ष्मजीव बेहद जरूरी है। जैव उर्वरक मिट्टी के लाभदायक सूक्ष्मजीव का प्रसार और अस्तित्व में मदद करते हैं। सूक्ष्मजीव मिट्टी के गुणों में सुधार करते हुए मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखते हुए मिटटी को पर्यावरण के अनुकूल और प्रदूषण मुक्त करते हैं।
हो रहा नील हरित शैवाल का उत्पादन
डॉ केशरी ने बताया कि अनुसन्धान केंद्र में नील हरित शैवाल का उत्पादन कर किसानों के लिए बेहद ही कम दामों पर उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि नील हरित शैवाल मुख्य रूप से धान के खेतों में डालते हैं, क्योंकि धान के खेत में हमेशा पानी भरा रहता है। इससे नील हरित शैवाल को धान के खेतों में लगातार वृद्धि और विकास के लिए अनुकूल माहौल मिल जाता है। इसके उपयोग से धान की फसल को करीब 20 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है। नील हरित शैवाल के इस्तेमाल से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों तथा अन्य पोषक तत्व जैसे ऑक्सीन, जिब्रेलीन, फाइरीडोक्सीन, इंडोल एसिटिक एसिड आदि की मात्रा बढ़ती है।
समय समय पर किसानों को जैव उर्वरक के इस्तमाल के लिए ट्रेनिंग दी जाती है । हजारों किसान अब तक हमसे जुड़ चुके है । राज्य जैव नियंत्रण प्रयोगशाला में तैयार जैव उर्वरक किसानों को बेहद कम दामों पर मुहैया कराए जा रहे है ।
डॉक्टर प्रमेंद्र केशरी, मृदा वैज्ञानिक, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय