बिलासपुर

SC आयोग की सिफारिश पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगाई रोक, कहा- दोष साबित करना आपराधिक न्यायालय का काम

Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एससी आयोग के अधिकार क्षेत्र पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि आयोग अपराध साबित होने का निष्कर्ष नहीं दे सकता। कोर्ट ने FIR की सिफारिश रद्द कर दी।
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Chhattisgarh SC Commission
SC आयोग की सिफारिश पर हाई कोर्ट का ब्रेक (Photo Source- Patrika File Photo)

Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि आयोग शिकायत की जांच कर सकता है और तथ्यों के आधार पर संबंधित सरकार या प्राधिकरण को कार्रवाई की सिफारिश दे सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अपराध साबित होने का निष्कर्ष नहीं दे सकता। यह अधिकार आपराधिक न्यायालय के क्षेत्र में आता है।

कोरबा के शासकीय महाविद्यालय बरपाली में पदस्थ असिस्टेंट प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव ने छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जाति आयोग की उस सिफारिश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की गई थी। आयोग ने अपनी सिफारिश में एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1) के तहत लगाए गए आरोप को प्रमाणित माना था। हाई कोर्ट ने आयोग की इस सिफारिश को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए रद्द कर दिया।

Bilaspur High Court: परीक्षा में नकल पकड़ने के बाद शुरू हुआ विवाद

मृगेश कुमार यादव की नियुक्ति राज्य सरकार ने 23 नवंबर 2012 को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर की थी। वर्तमान में वे कोरबा जिले के शासकीय महाविद्यालय बरपाली में पदस्थ हैं। मामले की शुरुआत परीक्षा के दौरान हुई एक घटना से हुई। परीक्षा के दौरान दीपमाला को कथित तौर पर नकल करते हुए मृगेश कुमार यादव और एक अन्य शिक्षिका खुशबू तिवारी ने पकड़ा था। इसके बाद दीपमाला ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग, रायपुर में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि नकल के मामले को लेकर उसे दबाव में लिया गया और परेशान किया गया।

आयोग ने नोटिस देकर मांगा था जवाब

शिकायत के बाद आयोग ने 21 जनवरी 2020 को मृगेश कुमार यादव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। उन्होंने 3 फरवरी 2020 को दस्तावेजों के साथ अपना विस्तृत जवाब आयोग के सामने रखा। याचिकाकर्ता का कहना था कि इन्हीं आरोपों को लेकर पहले भी जांच हो चुकी थी और शिकायत को झूठा पाया गया था। इसके बावजूद आयोग ने 16 मार्च 2021 को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश कर दी। इसके बाद असिस्टेंट प्रोफेसर ने हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट ने तय की आयोग की सीमा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि आयोग ने केवल एफआईआर की सिफारिश नहीं की, बल्कि आरोप को प्रमाणित भी घोषित कर दिया। वहीं आयोग की ओर से कहा गया कि उसने शिकायत की गंभीरता को देखते हुए जांच के बाद सिर्फ एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की थी। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आयोग शिकायतों की जांच कर सकता है।

संबंधित अधिकारियों के सामने कार्रवाई के लिए मामला रख सकता है, लेकिन पक्षकारों के अधिकारों का न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध साबित हुआ है या नहीं, इसका अंतिम फैसला आपराधिक न्यायालय ही कर सकता है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने 16 मार्च 2021 की आयोग की विवादित सिफारिश को रद्द कर दिया।

Updated on:
10 Sept 2026 04:53 pm
Published on:
10 Sept 2026 04:24 pm