
Meghna Gulzar On Raazi-Dhurandhar: फिल्ममेकर मेघना गुलजार ने अपनी चर्चित फिल्म 'राजी' और आदित्य धर की 'धुरंधर' में दिखाई गई देशभक्ति को लेकर अपनी राय रखी है। एक पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि दोनों फिल्मों में देशभक्ति का भाव मौजूद है, लेकिन उसे पर्दे पर दिखाने का तरीका कहानी के हिसाब से अलग है। मेघना ने फिल्म को लेकर क्या कुछ कहा है, चलिए जानते हैं।
मेघना गुलजार ने 'लर्न बॉय केके क्रिएट' पॉडकास्ट में कहा कि 'राजी' के किरदार 'धुरंधर' के किरदारों से किसी भी तरह कम देशभक्त नहीं हैं। उनके मुताबिक, दोनों फिल्मों की कहानियां अलग हैं और इसी वजह से किरदारों की देशभक्ति को दिखाने का तरीका भी अलग नजर आता है।
मेघना ने कहा कि एक फिल्म में किरदारों के एक्शन और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, जबकि दूसरी फिल्म में देशभक्ति को अलग अंदाज में दिखाया जा सकता है। जरूरी नहीं कि एक तरीका सही हो और दूसरा गलत।
मेघना ने देशभक्ति की अभिव्यक्ति को लेकर कहा कि इसे व्यक्त करने का कोई एक तय तरीका नहीं है। हर व्यक्ति अपनी भावनाओं और परिस्थितियों के हिसाब से देशभक्ति जाहिर करता है।
उन्होंने कहा कि देशभक्ति और प्रार्थना को व्यक्त करने के लिए ज्यादा शोर जरूरी नहीं है। उनका मानना है कि किसी फिल्म में देशभक्ति का शांत और व्यक्तिगत रूप भी उतना ही प्रभावी हो सकता है।
मेघना ने 'राजी' की मुख्य किरदार सहमत का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी देशभक्ति की कोई सीमा नहीं थी। हालांकि, उसके नैतिक मूल्यों की अपनी एक सीमा थी।
'राजी' में आलिया भट्ट ने सहमत का किरदार निभाया था। फिल्म में एक भारतीय महिला की कहानी दिखाई गई थी, जो पाकिस्तान के एक सैन्य परिवार में शादी करने के बाद भारत के लिए महत्वपूर्ण जानकारी जुटाती है। कहानी में देश के प्रति कर्तव्य और निजी जिंदगी के बीच संघर्ष को प्रमुखता दी गई थी।
आदित्य धर की 'धुरंधर' एक स्पाई-एक्शन फ्रेंचाइजी है, जिसमें रणवीर सिंह मुख्य भूमिका में हैं। वहीं 'राजी' जासूसी की कहानी को ज्यादा व्यक्तिगत और भावनात्मक नजरिए से पेश करती है।
मेघना की टिप्पणी इसी अंतर पर केंद्रित रही कि दोनों फिल्मों में देशभक्ति का भाव मौजूद हो सकता है, लेकिन उसे दिखाने के लिए एक जैसा तरीका जरूरी नहीं है।
मेघना गुलजार इन दिनों अपनी नई फिल्म 'दायरा' को लेकर भी चर्चा में हैं। फिल्म में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन मुख्य भूमिकाओं में हैं। कहानी कानून, न्याय और त्वरित न्याय के बीच की नैतिक दुविधा को सामने रखती है।