Rajpal Yadav Costar Padam Singh Defends Him: बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव इन दिनों बड़े कानूनी संकट का सामना कर रहे हैं। इसी बीच उनके को-स्टार खुलकर उनके समर्थन में आए हैं।
Rajpal Yadav Costar Padam Singh Defends Him: कॉमेडी के लिए मशहूर अभिनेता राजपाल यादव इन दिनों कानूनी संकट के चलते सुर्खियों में हैं। साल 2012 में आई उनकी फिल्म ‘अता पता लापता’ से जुड़े चेक बाउंस मामले में उन्हें छह महीने की सजा काटनी पड़ रही है। करीब 9 करोड़ रुपये के बकाया विवाद ने एक बार फिर इस फिल्म और उससे जुड़े वित्तीय पहलुओं को चर्चा में ला दिया है।
इसी बीच फिल्म में उनके साथ काम कर चुके अभिनेता पद्म सिंह ने सामने आकर राजपाल यादव का बचाव किया है। उनका कहना है कि यह मामला लापरवाही का नहीं बल्कि परिस्थितियों और आर्थिक दबाव का परिणाम है।
पद्म सिंह ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा- 'उन्होंने ‘अता पता लापता’ बहुत दूरदर्शी सोच और पूरी ईमानदारी के साथ बनाई थी। फिल्म का निर्देशन भी उन्होंने खुद किया। इंडस्ट्री के कई लोगों ने उत्साह से इसमें काम किया। उस समय जो निवेश आया, उस पर ब्याज बढ़ता गया। वो मानसिक रूप से बहुत मजबूत इंसान हैं और हर परिस्थिति का सामना करने की ताकत रखते हैं। उन पर गुरुदेव का आशीर्वाद है।'
उनके मुताबिक इस प्रोजेक्ट से कई दिग्गज कलाकार जुड़े थे। ओम पुरी, असरानी, गोविंद नामदेव, दारा सिंह और आशुतोष राणा जैसे नामों ने फिल्म के विजन पर भरोसा जताते हुए इसमें काम किया। पद्म सिंह का कहना है कि फिल्म की सोच और संदेश क्लासिक सिनेमा से प्रेरित था, लेकिन रिलीज के समय दर्शकों से वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी।
बताया जाता है कि फिल्म का निर्माण करीब ढाई साल तक चला। शुरुआत में इसका बजट लगभग 6 करोड़ रुपये तय किया गया था, लेकिन समय के साथ लागत बढ़कर करीब 20 करोड़ तक पहुंच गई। उधार लिए गए पैसों पर बढ़ता ब्याज और रिलीज में हुई देरी ने आर्थिक बोझ और बढ़ा दिया।
रिलीज के बाद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। कम कमाई ने निर्माता-निर्देशक राजपाल यादव को भारी वित्तीय संकट में डाल दिया।
राजपाल यादव के व्यक्तित्व का जिक्र करते हुए पद्म सिंह ने कहा- 'उनकी नीयत बिल्कुल साफ है। अगर उन्हें थोड़ा समय मिल जाए तो वह एक-एक पैसा लौटाने की क्षमता रखते हैं और लौटाएंगे भी। मैं उन्हें 1997 से जानता हूं। उन्होंने हमेशा दूसरों के लिए काम किया है।' उनका मानना है कि यह पूरा विवाद किसी गलत इरादे का परिणाम नहीं, बल्कि असफल रचनात्मक जोखिम और वित्तीय दबाव की देन है।
कर्ज चुकाने के लिए जारी किए गए कई चेक बाउंस होने के बाद उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई, जिसे बाद में सेशन कोर्ट ने भी बरकरार रखा। उच्च न्यायालय से भी उन्हें किस्तों में भुगतान के लिए कई मौके मिले, लेकिन तय समयसीमा पूरी न होने पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया।
हालांकि बीच में सजा पर अस्थायी रोक भी लगी, लेकिन बकाया रकम का बड़ा हिस्सा जमा न हो पाने के कारण आखिरकार उन्हें सरेंडर करना पड़ा।