
Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups Review In Hindi: गैंगस्टर और एक्शन फिल्मों की दुनिया में कुछ चीजें लगभग तय मानी जाती हैं-बंदूकें, खून-खराबा, ताकत और बदले की कहानी। लेकिन ‘टॉक्सिक’ इन सबको एक बड़े और अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश करती है। फिल्म में क्राइम और एक्शन के साथ परिवार, प्यार और रिश्तों को भी कहानी का जरूरी हिस्सा बनाया गया है। इसका विशाल विजुअल स्केल इसे भव्य बनाता है, वहीं कहानी की कई परतें इसे महज एक आम मसाला एक्शन फिल्म बनने से बचाती हैं। आखिर कैसी है यश की 'टॉक्सिक', चलिए रिव्यू में जानते हैं।
कहानी राया से शुरू होती है, जिसका अपराध की दुनिया में बड़ा नाम है। उसका दबदबा ऐसा है कि लोग उसके सामने आने से पहले कई बार सोचते हैं। राया के लिए ताकत और वफादारी सबसे ऊपर हैं। लेकिन जब उसका बेटा टिकट इस खतरनाक दुनिया में आता है, तो कहानी का रंग बदलने लगता है। टिकट की एंट्री के साथ सिर्फ गैंगस्टरों की लड़ाई नहीं रह जाती, बल्कि परिवार, प्यार, बदला और अपनों को बचाने की जद्दोजहद भी कहानी में शामिल हो जाती है। गंगा और नादिया जैसे किरदार कहानी को इमोशनल वजन देते हैं और धीरे-धीरे फिल्म की दुनिया और ज्यादा उलझी और खतरनाक होती जाती है।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यश का डबल रोल है। राया और टिकट एक ही परिवार से हैं, लेकिन दोनों के व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है। राया के किरदार में गुस्सा, रौब और गैंगस्टर वाला अंदाज खूब नजर आता है। दूसरी तरफ टिकट के रोल में यश का शांत और भावुक पक्ष देखने को मिलता है। दोनों किरदारों की बॉडी लैंग्वेज, बोलने का तरीका और स्क्रीन पर मौजूदगी इतनी अलग रखी गई है कि दर्शक दोनों को आसानी से अलग पहचान लेते हैं। कहानी आगे बढ़ने के साथ इनके रिश्ते और पहचान से जुड़े राज भी धीरे-धीरे सामने आते हैं।
नयनतारा गंगा के किरदार में कहानी को भावनात्मक मजबूती देती हैं। कियारा आडवाणी नादिया के रूप में मासूमियत और संवेदनशीलता लेकर आती हैं। हुमा कुरैशी की एलिजाबेथ वाली मौजूदगी काफी प्रभावशाली है और वो स्क्रीन पर आते ही ध्यान खींच लेती हैं। रुक्मिणी वसंत का मेलिसा वाला किरदार भी खास है। वो ज्यादा शोर किए बिना अपने एक्सप्रेशन और खामोशी से असर छोड़ती हैं। तारा सुतारिया, अक्षय ओबेरॉय, डैरेल डी'सिल्वा और सुदेव नायर भी कहानी को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। यही पूरी कास्ट फिल्म को सिर्फ दो किरदारों की कहानी नहीं रहने देती, बल्कि एक बड़े क्राइम वर्ल्ड का रूप दे देती है।
‘टॉक्सिक’ की शुरुआत भी सीधे एक्शन से नहीं होती। फिल्म पहले धीरे-धीरे अपनी दुनिया तैयार करती है। दर्शकों को राया की ताकत, उसके रिश्तों और उसके आसपास के लोगों से परिचित कराया जाता है। हालांकि कहानी गंभीर है, लेकिन बीच-बीच में मास एंटरटेनमेंट का भरपूर डोज मिलता रहता है। इसी वजह से शुरुआती हिस्सा ज्यादा खिंचा हुआ महसूस नहीं होता। डायरेक्टर गीतू मोहनदास कहानी को जल्दबाजी में आगे बढ़ाने के बजाय वक्त देती हैं। और फिर इंटरवल से पहले ऐसा सीक्वेंस आता है जो पूरी फिल्म का मूड बदल देता है। इंटरवल पर कई सवाल खड़े होते हैं और यही चीज दूसरे हाफ को लेकर उत्सुकता बढ़ा देती है।
दूसरे हाफ में फिल्म की रफ्तार काफी तेज हो जाती है। एक्शन ज्यादा बड़ा और आक्रामक हो जाता है। लड़ाई के सीन में हिंसा और इंटेंसिटी दोनों बढ़ जाती हैं। यहीं से ‘टॉक्सिक’ अपने बड़े कैनवास को पूरी तरह इस्तेमाल करती नजर आती है। बड़े सेट, भारी-भरकम एक्शन सीक्वेंस और लगातार बढ़ता तनाव फिल्म को एक अलग स्तर देते हैं। खास बात यह है कि एक्शन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं लगता, बल्कि उसके पीछे कहानी और किरदारों की अपनी वजह भी है। यही चीज इन सीक्वेंस को ज्यादा असरदार बनाती है।
गीतू मोहनदास ने कहानी को एक सीधी लकीर में चलाने के बजाय कई हिस्सों में बांटा है। हर किरदार की अपनी कहानी, अपनी मजबूरी और अपना मकसद है। शुरुआत में ये सारी चीजें अलग-अलग लगती हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ने लगती हैं। फिल्म हर राज का जवाब तुरंत नहीं देती। कई चीजों को जानबूझकर छिपाकर रखा गया है, जिससे दर्शक भी कहानी के साथ अनुमान लगाने लगते हैं। आपको कई घटनाओं को खुद जोड़ना पड़ता है और इसी वजह से सस्पेंस बना रहता है।
‘टॉक्सिक’ की कहानी का एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि ये आपको बहुत आसानी से आगे का अंदाजा नहीं लगाने देती। जब लगता है कि कहानी अब समझ में आ गई है, तभी कोई नया मोड़ सामने आ जाता है। क्लाइमैक्स में आने वाला ट्विस्ट पहले के कई सीन को एक अलग नजरिए से देखने पर मजबूर करता है। फिल्म खत्म होने के बाद भी कुछ सवाल दिमाग में बने रहते हैं, जो इसके अंत को थोड़ा ज्यादा असरदार बनाते हैं।
कुल मिलाकर ‘टॉक्सिक’ उन दर्शकों के लिए ज्यादा बेहतर अनुभव हो सकती है जिन्हें बड़े पर्दे पर ग्रैंड विजुअल्स, जबरदस्त एक्शन और थोड़ी उलझी हुई कहानी पसंद है। यश का अलग अंदाज, डार्क गैंगस्टर वर्ल्ड, रिश्तों की कहानी और दूसरे हाफ के बड़े एक्शन सीक्वेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। अगर आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जिसमें सिर्फ मारधाड़ ही नहीं, बल्कि किरदारों के रिश्ते, उनके इमोशंस और कहानी के पीछे छिपे राज भी हों, तो ‘टॉक्सिक’ को थिएटर में एक मौका दिया जा सकता है।