ऐतिहासिक विरासत और स्थापत्य सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध बूंदी शहर के मध्य चौगान गेट के पास स्थित नागर सागर कुण्ड आज उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।
बूंदी. ऐतिहासिक विरासत और स्थापत्य सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध बूंदी शहर के मध्य चौगान गेट के पास स्थित नागर सागर कुण्ड आज उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। कभी उन्नत जल संरक्षण प्रणाली के प्रतीक रहे ये जुड़वां सीढ़ीदार कुएं अब बदहाल स्थिति में हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक जहां इनकी भव्यता को निहारने पहुंचते हैं, वहीं स्थानीय स्तर पर देखरेख के अभाव ने इस धरोहर की चमक फीकी कर दी है।
19वीं सदी के उत्तरार्ध (लगभग 1871-75) में निर्मित नागर सागर कुण्ड का निर्माण महाराजा राम सिंह के शासनकाल में महारानी चंद्रभानु कुमारी द्वारा कराया गया था। मूल रूप से इन्हें यमुना सागर और गंगा सागर नाम दिया गया था। इनका उद्देश्य शहर में बढ़ते जल संकट का समाधान करना और वर्षाजल संचयन को बढ़ावा देना था।वास्तुकला की दृष्टि से ये कुण्ड अद्वितीय हैं। दोनों कुण्ड समान आकार और संरचना वाले हैं, जिनमें नीचे तक जाती सीढिय़ा पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और मूर्तिकला देखने को मिलती है।
पर्यटक हो रहे निराश
कुण्डों में कचरा डाले जाने, जल भराव की कमी और सफाई के अभाव ने इन्हें जर्जर बना दिया है। दीवारों पर गंदगी और आसपास फैली अव्यवस्था पर्यटकों को निराश करती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण और नियमित देखरेख नहीं की गई तो यह ऐतिहासिक धरोहर गंभीर नुकसान झेल सकती है।
सामूहिक प्रयास की जरूरत
पर्यटन की दृष्टि से भी नागर सागर कुण्ड का महत्व कम नहीं है। बूंदी अपने किलों, बावड़ियों और चित्रशैली के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखता है। ऐसे में शहर के मध्य स्थित यह ऐतिहासिक स्थल बेहतर प्रबंधन के साथ पर्यटन का प्रमुख आकर्षण बन सकता है। जरूरत है प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों के सामूहिक प्रयास की, ताकि इस धरोहर को उसकी पूर्व गरिमा लौटाई जा सके।