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RBI के एक फैसले ने रुपये को किया 1.3% मजबूत, जानिए कैसे रुपये की डूबती नाव को मिला सहारा

RBI: शुक्रवार को रिजर्व बैंक की ओर से जारी एक निर्देश के बाद से सोमवार को भारतीय रुपये में मजबूती देखी गई। इस फैसले में भारतीय बैंकों द्वारा किए जाने वाले आर्बिट्रेज ट्रेड को सीमित कर दिया गया।
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Mar 30, 2026
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रुपये ने की 94.84 के ऐतिहासिक निचले स्तर से वापसी। फोटो: एआइ

भारतीय मुद्रा बाजार में सोमवार, 30 मार्च 2025 को रुपये में मजबूती देखी गई। रुपये में यह मजबूती भारतीय रिजर्व बैंक के एक महत्वपूर्ण फैसले से आई है। दरअसल, रुपया शुक्रवार को अपने ऑल टाइम लो की पॉजीशन 94.84 प्रति डॉलर तक गिर चुका था और मार्च में रुपया सात साल की सबसे बड़ी गिरावट झेल चुका था। लेकिन सोमवार को अचानक 1.3 फीसदी उछलकर 93.59 पर आ गया।

RBI के फैसले से चमका रुपया

27 मार्च को RBI ने एक निर्देश जारी किया जिसमें कहा गया कि अब कोई भी बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हर कारोबारी दिन के अंत तक अपनी नेट ओपन पॉजीशन यानी NOP 10 करोड़ डॉलर से अधिक नहीं रख सकता और इसकी डेडलाइन 10 अप्रैल तय की गई। इस फैसले के बाद से जिन बैंकों ने अरबों डॉलर की पोजिशन बना रखी थी, उन्हें वह डॉलर घरेलू बाजार में बेचने पड़े। RBI के इस फैसले के बाद डॉलर की बिकवाली शुरू हो गई। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी.के. विजयकुमार ने कहा कि बड़े डॉलर पोजिशन का यह उलटाव निकट भविष्य में रुपये को मजबूती देगा। 30 मार्च को रुपया 1.3 फीसदी की छलांग लगाकर 93.59 पर पहुंच गया। यह RBI के फैसले का तत्काल असर था।

आर्बिट्रेज ट्रेड के कारण डूब रहा था रुपया

भारतीय बैंक आर्बिट्रेज ट्रेड कर रहे थे यानी वे भारत के घरेलू बाजार (Onshore Market) में डॉलर खरीदते थे और उसे विदेश में स्थित NDF यानी नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (Non-Deliverable Forward) मार्केट में ऊंचे दाम पर बेचते थे। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह था कि घरेलू बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती रही और रुपया कमजोर होता गया। ईरान संघर्ष से उत्पन्न जोखिम और तेल संबंधी दबावों के कारण घरेलू बाजार और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड बाजार के स्प्रेड में वृद्धि हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार इन आर्बिट्रेज पोजिशन का कुल आकार 25 अरब डॉलर से लेकर 50 अरब डॉलर से भी अधिक था।

रुपया 7 साल की सबसे बड़ी गिरावट में

मार्च 2026 में रुपया 4 फीसदी से ज्यादा टूट चुका था और सात साल में यह एक महीने की सबसे बड़ी गिरावट थी। इसके पीछे तीन बड़े कारण थे। पहला- ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही थीं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का मतलब है ज्यादा डॉलर खर्च करना, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। दूसरा- विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII भारतीय बाजारों से लगातार पैसा निकाल रहे थे, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर पड़ा। तीसरा- वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ी। इन तीनों झटकों ने मिलकर रुपये को 94.84 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंचा दिया था।

Updated on:
30 Mar 2026 12:29 pm
Published on:
30 Mar 2026 12:28 pm