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Rupee Fall: रुपया 96 पार, क्या रूस, जापान और इजराइल को वर्कफोर्स एक्सपोर्ट से संभलेगा रुपया?

Rupee Fall News: रुपये पर बढ़ते दबाव और तेल कीमतों की चिंता के बीच भारत अब स्किल्ड वर्कर्स को बड़े पैमाने पर विदेश भेजने की रणनीति पर काम कर रहा है। इजरायल, जापान और रूस जैसे देशों में भारतीय टैलेंट की मांग बढ़ रही है।

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भारत

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Pawan Jayaswal

May 19, 2026

Indian Rupee

Indian Rupee: मंगलवार को रुपये ने नया ऑल टाइम लो बनाया है। (PC: AI)

Indian Rupee and Remittance: भारतीय रुपया लगातार दबाव में है। यह रोज नया ऑल टाइम लो बना रहा है। मंगलवार को रुपये ने एक डॉलर के मुकाबले 96.47 का रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर बनाया है। उधर तेल की बढ़ी हुई कीमतों से देश के चालू खाते घाटे के और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। ऐसे में सरकार देश में विदेशी मुद्रा लाने के लिए एक अलग रास्ते पर तेजी से काम कर रही है। यह रास्ता है भारतीय टैलेंट को दुनियाभर में भेजने का। यानी आने वाले समय में भारत सिर्फ सामान या सेवाएं ही नहीं, बल्कि अपने स्किल्ड लोगों को भी बड़े पैमाने पर ‘एक्सपोर्ट’ करेगा। ये लोग भारत में रेमिटेंस यानी विदेशी मुद्रा भेजेंगे, जिससे गिरते रुपये को संभालने में मदद मिलेगी।

रोजगार तो मिलेगा ही, मजबूत रेमिटेंस नेटवर्क भी बनेगा

भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, जबकि कई विकसित देशों के पास पैसा तो है, लेकिन काम करने वाले लोग नहीं हैं। ऐसे में भारत इस मौके को भुनाकर विदेशी मुद्रा कमाने और रुपये को मजबूती देने की तैयारी में जुट गया है। ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्रालय ने स्किल डेवलपमेंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप मंत्रालय से इजरायल के लिए स्किल्ड वर्कर्स की तैनाती तेज करने को कहा है। सरकार चाहती है कि सुरक्षित सरकारी व्यवस्था के तहत ज्यादा से ज्यादा प्रशिक्षित भारतीय कामगार विदेश भेजे जाएं। मकसद सिर्फ रोजगार देना नहीं है, बल्कि लंबे समय तक मजबूत रेमिटेंस नेटवर्क तैयार करना भी है।

असल में विदेशों में काम करने वाले भारतीय हर साल देश में अरबों डॉलर भेजते हैं। यही पैसा मुश्किल समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ढाल का काम करता है। जब रुपये पर दबाव बढ़ता है, तब विदेश से आने वाला पैसा बड़ी राहत देता है।

नए देशों की तरफ बढ़ रहा भारतीय टैलेंट

दुनिया का माइग्रेशन मैप भी तेजी से बदल रहा है। पहले भारतीय युवाओं का सपना अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन या यूरोप में बसना होता था। लेकिन अब इन देशों में वीजा नियम सख्त होते जा रहे हैं। स्थानीय राजनीति और बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण वहां इमिग्रेशन आसान नहीं रहा। इसका असर यह हुआ कि भारतीय टैलेंट अब नए देशों की तरफ बढ़ रहा है। भारत के लिए अच्छी बात यह है कि एक तरफ पश्चिमी देश दरवाजे बंद कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ कई एशियाई और पूर्वी यूरोपीय देशों में कामगारों की भारी कमी हो गई है। जापान, रूस और इजरायल जैसे देशों को बड़ी संख्या में स्किल्ड लोगों की जरूरत है। भारत अब इसी मौके को पकड़ना चाहता है।

नया बिल लाने की तैयारी

सरकार नया Overseas Mobility Bill लाने की तैयारी में है। यह कानून पुराने Emigration Act 1983 की जगह ले सकता है। नए सिस्टम का मकसद होगा कि विदेश जाने वाले भारतीयों को सुरक्षित नौकरी मिले, उनके साथ गलत व्यवहार न हो और जरूरत पड़ने पर वापसी के बाद उन्हें फिर से रोजगार से जोड़ा जा सके।

50,000 भारतीयों को रोजगार देगा इजराइल

फिलहाल सबसे ज्यादा फोकस इजरायल पर है। फरवरी में दोनों देशों के बीच हुए समझौतों के बाद इजरायल अगले पांच साल में करीब 50 हजार भारतीय कामगारों को रोजगार देने की तैयारी में है। इन लोगों की जरूरत मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस, रेस्टोरेंट और दूसरे सेक्टर्स में पड़ेगी। इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी NSDC को दी गई है। यह संस्था उम्मीदवारों की जांच और ट्रेनिंग का काम देख रही है, ताकि विदेश भेजे जाने वाले भारतीय कामगार पूरी तरह योग्य हों।

इजरायल के आंकड़ों के मुताबिक, वहां पहले से करीब 48 हजार से ज्यादा भारतीय रह रहे हैं। इनमें हजारों कंस्ट्रक्शन वर्कर्स और केयरगिवर्स भी शामिल हैं, जिन्हें सरकारी चैनल के जरिए भेजा गया था।

रूस में होगी लाखों कामगारों की जरूरत

इजरायल के अलावा रूस भी भारतीयों के लिए बड़ा रोजगार बाजार बनता दिख रहा है। रूस को अगले कुछ सालों में लाखों कामगारों की जरूरत पड़ेगी। वहां मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सेक्टर में कर्मचारियों की भारी कमी है। इसी वजह से रूस ने विदेशी विशेषज्ञों के लिए वीजा नियम आसान किए हैं और कोटा भी बढ़ाया है। पिछले साल मोदी और पुतिन के बीच हुई बैठक के बाद दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए थे। माना जा रहा है कि आने वाले समय में बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ रूस जा सकते हैं।

जापान इमिग्रेशन नीति में दे रहा ढील

जापान भी अब अपनी पुरानी सख्त इमिग्रेशन नीति में ढील दे रहा है। वहां तेजी से बूढ़ी होती आबादी के कारण कामगारों की भारी कमी हो गई है। भारत और जापान के बीच बने Human Resources Action Plan के तहत अगले पांच साल में पांच लाख लोगों की आवाजाही बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें हजारों भारतीय स्किल्ड और सेमी-स्किल्ड वर्कर्स शामिल होंगे। जापान खासतौर पर हेल्थकेयर, हॉस्पिटैलिटी, मैन्युफैक्चरिंग और केयरगिविंग सेक्टर के लिए भारतीय युवाओं को मौका देना चाहता है।

टेक कंपनियों की बदली रणनीति

दूसरी तरफ बड़ी टेक कंपनियां भी अपनी रणनीति बदल रही हैं। पहले कंपनियां भारतीय इंजीनियरों को अमेरिका या यूरोप बुलाती थीं, लेकिन अब वीजा दिक्कतों के कारण कंपनियां वहीं ऑफिस बना रही हैं, जहां टैलेंट मौजूद है। यही वजह है कि अब सिंगापुर, जापान, नीदरलैंड और भारत में ही हाई-पेइंग टेक जॉब्स बढ़ रही हैं। पिछले साल IIT प्लेसमेंट में भी इसका असर साफ दिखा। कई अमेरिकी कंपनियों ने सीधे अमेरिका में नौकरी देने के बजाय दूसरे देशों या भारत में ही रोल ऑफर किए। कंपनियां अब वीजा के झंझट में फंसने के बजाय स्थानीय और रीजनल हब मॉडल पर काम कर रही हैं।

FDI से भी ज्यादा हो जाता है रेमिटेंस का पैसा

भारत के लिए सबसे बड़ी ताकत रेमिटेंस है। विदेश में काम करने वाले भारतीय हर साल इतना पैसा भेजते हैं, जो कई बार विदेशी निवेश से भी ज्यादा होता है। आर्थिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक FY25 में भारत को 135.4 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला। यह दुनिया में सबसे ज्यादा है। इसी दौरान भारत में कुल FDI करीब 47 अरब डॉलर रहा। यानी विदेश में काम कर रहे भारतीयों ने विदेशी निवेशकों से लगभग तीन गुना ज्यादा पैसा भारत भेजा।

यही वजह है कि सरकार अब इसे सिर्फ रोजगार का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की रणनीति के तौर पर देख रही है। अगर भविष्य में रुपये पर अचानक दबाव बढ़ता है, तो विदेशों में बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय कामगार देश के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम बन सकते हैं। आने वाले समय में भारत सिर्फ दुनिया का बैक ऑफिस नहीं रहेगा। सरकार की कोशिश है कि भारत दुनिया का सबसे भरोसेमंद स्किल्ड वर्कफोर्स सप्लायर बने। अगर यह रणनीति सफल रही, तो इससे रोजगार, विदेशी मुद्रा और भारतीय अर्थव्यवस्था तीनों को लंबे समय तक मजबूती मिल सकती है।