
भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है। (PC: AI)
Indian Rupee Fall: रुपया जब गिरता है तो उसका असर सीधे आपकी जेब पर पड़ता है। रसोई के बजट से लेकर लाइफस्टाइल खर्चे तक सब बढ़ जाते हैं। बाहर खाना महंगा हो जाता है, विदेश घूमना मुश्किल लगने लगता है और बच्चों की विदेशी पढ़ाई का सपना भी ज्यादा खर्चीला हो जाता है। मिडिल ईस्ट संकट के बीच रुपया ऐसे गिर रहा है, जैसे ब्रेक फेल हो गए हों। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया आज गुरुवार दोपहर गिरकर 95.95 पर पहुंच गया है। यह अब तक का सबसे न्यूनतम स्तर है। रुपये की यही चाल रही तो यह आंकड़ा आने वाले समय में 100 तक भी पहुंच सकता है। पिछले कई महीनों से रुपया लगातार दबाव में था, लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद हालात और बिगड़ गए। अब सवाल सिर्फ करेंसी का नहीं, आम आदमी के बजट का भी है।
पीछे जाकर देखें, तो अधिकांश वर्षों में भारतीय रुपया हर साल औसतन 3 से 5 फीसदी गिरा है। लेकिन पिछले एक साल में भारतीय रुपया करीब 10 फीसदी गिरा है। यह औसत गिरावट से काफी ज्यादा अधिक है। मई 2025 में रुपया डॉलर के मुकाबले 85 के करीब था, जो मई 2026 में 96 के लेवल से थोड़ा ही कम है।
सबसे बड़ी वजह महंगा कच्चा तेल है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल विदेशों से खरीदता है। जब तेल महंगा होता है, तो ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे रुपये पर दबाव बढ़ जाता है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। वे भारत से डॉलर निकालकर अमेरिका जैसे बाजारों की तरफ जा रहे हैं। टैरिफ वॉर और ईरान युद्ध के दौरान डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ है, जिससे रुपये समेत कई एशियाई मुद्राएं कमजोर हो रही हैं। पिछले कुछ महीनों से सोना, चांदी, खाद, मेटल और कई जरूरी सामानों के आयात भी महंगे हो गए हैं। यानी हर तरफ से रुपये पर मार पड़ रही है।
रुपये की गिरावट का बड़ा असर घर के बजट पर भी दिखता है। रुपया गिरने से तेल कंपनियों को लागत के मुकाबले कम राजस्व मिलता है। इसलिए उन्हें फ्यूल महंगा करना पड़ता है। डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है। ट्रक का किराया बढ़ता है, सामान ढोने की लागत बढ़ती है और आखिरकार हर चीज की कीमत बढ़ जाती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने का असर सिर्फ गाड़ी चलाने वालों पर नहीं पड़ता। सब्जी, दूध, राशन, ऑनलाइन डिलीवरी, टैक्सी, बस और फ्लाइट टिकट तक सब प्रभावित होते हैं।
मिडिल ईस्ट तनाव के बाद LPG की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। होटल और रेस्टोरेंट का खर्च बढ़ा है। बाहर खाना और फूड डिलीवरी अब पहले से ज्यादा महंगी लगने लगी है। भारत बड़ी मात्रा में खाने का तेल भी आयात करता है। रुपया गिरने से इसके दाम में बढ़ोतरी होती है।
हालांकि, फिलहाल राहत यह है कि अभी सिर्फ कमर्शियल डीजल ही महंगा हुआ है। पेट्रोल के दाम यथावत हैं। लेकिन जिस तरह से तेल कंपनियों का नुकसान बढ़ रहा है, कभी भी पेट्रोल के दाम बढ़ाए जा सकते हैं।
भारत में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी कई इलेक्ट्रॉनिक सामान और उनके पार्ट्स विदेश से आते हैं। कई तरह के मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, कैमरा और दूसरे गैजेट्स या उनके पार्ट्स डॉलर देकर आयात किये जाते हैं। यानी रुपया कमजोर होते ही कंपनियों की लागत बढ़ जाती है और उसका बोझ ग्राहक पर आता है।
भारत में ज्यादातर सोना विदेश से आता है। इसलिए रुपया गिरते ही सोना और चांदी दोनों महंगे हो जाते हैं। व्यापार घाटे को कम करने के लिए हाल ही में सरकार ने सोने पर आयात शुल्क को बढ़ाकर 15 फीसदी किया है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। हालांकि, जिन लोगों ने पहले से गोल्ड ETF या सोने में निवेश कर रखा है, उन्हें फायदा हो सकता है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने के साथ रुपये की कमजोरी भी उनके रिटर्न में जुड़ जाती है।
अगर आप इस साल विदेश घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो जेब थोड़ी ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी। मान लीजिए पिछले साल किसी ट्रिप पर 2 लाख रुपये खर्च होने थे। अब वही ट्रिप सिर्फ रुपये की कमजोरी की वजह से करीब 10 फीसदी तक महंगी हो सकती है। दुनिया के कई देशों में होटल, फ्लाइट, लोकल ट्रैवल और खाने का बिल डॉलर में तय होता है। ऐसे में कमजोर रुपया हर खर्च को और बड़ा बना देता है।
जो परिवार बच्चों को अमेरिका, ब्रिटेन या दूसरे देशों में पढ़ाने का सपना देख रहे हैं, उनके लिए भी मुश्किल बढ़ सकती है। अगर रुपया उम्मीद से ज्यादा तेजी से गिरता है, तो पहले बनाया गया एजुकेशन फंड कम पड़ सकता है। यानी आपको ज्यादा बचत करनी पड़ सकती है या लोन का सहारा लेना पड़ सकता है।
विदेशी निवेशक भारतीय सरकारी बॉन्ड बेच रहे हैं। क्योंकि कमजोर रुपया उनके रिटर्न को कम कर देता है। इसके चलते गिल्ट फंड्स पर भी दबाव दिखा है और पिछले कुछ समय में इनके रिटर्न फीके रहे हैं।
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ऐसे दौर में कुछ पैसा इंटरनेशनल फंड्स या डॉलर आधारित एसेट्स में लगाना फायदेमंद हो सकता है। इसके अलावा खर्चों पर कंट्रोल, गैर-जरूरी खरीदारी से बचना और लंबी अवधि के लिए इक्विटी निवेश बनाए रखना भी मदद कर सकता है। शेयर बाजार और इक्विटी म्यूचुअल फंड्स लंबे समय में महंगाई से लड़ने का अच्छा जरिया माने जाते हैं।
Updated on:
14 May 2026 06:58 pm
Published on:
14 May 2026 06:57 pm
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