Bare Minimum Culture: लाखों के पैकेज वाली जॉब में एक आईआईटी ग्रेजुएट को 'बेयर मिनिमम' कल्चर का सामना करना पड़ रहा है। इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया है कि कैसे कम काम और खराब टीम कल्चर उनके करियर की ग्रोथ को खत्म कर रहा है।
Developer : आज के समय में हर युवा का सपना किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पाना होता है। लेकिन क्या सच में वहां का माहौल वैसा होता है, जैसा बाहर से दिखता है? हाल ही में टियर-1 संस्थान से साल 2025 में पास आउट हुए एक IIT ग्रेजुएट ने अपनी जॉब से जुड़ी एक ऐसी सच्चाई बयान की है, जिसने कॉर्पोरेट दुनिया की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बतौर जूनियर डवलपर उन्होंने एक बड़ी कंपनी ज्वाइन की थी, लेकिन उनका अनुभव उम्मीदों से बिल्कुल अलग रहा। उनका कहना है कि 'बेयर मिनिमम कल्चर' के कारण उनकी ग्रोथ पूरी तरह से रुक गई है और टीम का माहौल भी काफी निराशाजनक है।
इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर एक पोस्ट शेयर करते हुए अपनी परेशानी साझा की। शुरुआत में उन्हें एक जनरेटिव एआई प्रोजेक्ट सौंपा गया था, लेकिन काम शुरू होने से पहले ही वह प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया। इसके बाद जब उन्होंने अपने मैनेजर से बात की, तो उन्हें एक मेंटेनेंस टीम में डाल दिया गया। यहां कोडिंग और डवलपमेंट का काम न के बराबर है। दिनभर का रूटीन केवल ऑफिस आना, कुछ ईमेल और मैसेज चेक करना और फिर यूट्यूब या इंस्टाग्राम रील्स देखकर समय बिताना रह गया है।
इस पोस्ट के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स के अलग-अलग रिएक्शन सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों ने इस स्थिति पर चिंता जताई, तो कुछ ने इसे 'ड्रीम जॉब' करार दिया। 15 साल का अनुभव रखने वाले एक यूजर ने लिखा कि इतने सालों के अनुभव के बाद बिना काम के ऑफिस में समय बिताना एक सपने जैसा लगता है। वहीं एक अन्य यूजर ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अगले चार साल तक कोई नई स्किल नहीं सीखी, तो दूसरी कंपनी में जॉब मिलना लगभग असंभव हो जाएगा। यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि कई युवा प्रोफेशनल्स इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहे हैं।
इस समय यह इंजीनियर अपनी स्किल्स को अपग्रेड करने और किसी स्टार्टअप से जुड़ने पर विचार कर रहा है। हालांकि, मौजूदा समय में जॉब मार्केट के अंदर काफी कड़ा मुकाबला है। एक बड़ी समस्या यह भी उभर कर सामने आई है कि जिन छोटे टास्क को करके पहले फ्रेशर्स नई चीजें सीखते थे, अब वे सारे काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर से कुछ ही सेकंड में पूरे कर लिए जाते हैं। इस वजह से नए लोगों के लिए सीखने और प्रैक्टिकल अनुभव प्राप्त करने के अवसर लगातार कम हो रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का एक पहलू यह भी है कि बड़ी कंपनियों में अक्सर सीनियर कर्मचारियों का ध्यान सिर्फ अपने काम तक सीमित रहता है। वे अपने 'बबल' से बाहर निकलकर जूनियर्स को मेंटर करने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाते। यही 'बेयर मिनिमम' रवैया जूनियर्स के उत्साह को खत्म कर देता है, जिससे उनमें निराशा और ठहराव की भावना पैदा होने लगती है। करियर की शुरुआत में मेंटरशिप की कमी एक बड़ी चुनौती है, जिस पर कंपनियों के एचआर विभाग को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।