
Iran US Conflict: ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को दोबारा खोलने का संकेत देकर वैश्विक बाजारों में हलचल बढ़ा दी है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के एक सीनियर अधिकारी ने कहा है कि अगर अमेरिका सैन्य दबाव कम करता है और ईरानी बंदरगाहों पर लगी नाकाबंदी हटाता है, तो तेहरान करीब 7 दिन के भीतर हॉर्मुज स्ट्रेट खोल सकता है। इस खबर का असर तुरंत कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दिया। मंगलवार शाम को ब्रेंट क्रूड करीब 2% गिरकर 98.33 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। बाजार को उम्मीद है कि अगर हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो वैश्विक तेल सप्लाई को राहत मिल सकती है। हालांकि, अभी यह सिर्फ ईरान की ओर से सामने आया प्रस्ताव है, किसी समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान का यह प्रस्ताव 16 सितंबर को मध्यस्थों के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया गया था। ईरानी अधिकारी ने बताया कि दोनों देशों के बीच संघर्ष खत्म करने को लेकर बातचीत न्यूयॉर्क में मध्यस्थों की मदद से हो सकती है। ईरान की तरफ से यह संकेत ऐसे समय आया है जब हॉर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पहले ही काफी कम हो चुकी है। 18 सितंबर को सिर्फ चार कमोडिटी जहाज इस रास्ते से गुजरे थे, जबकि पिछले 10 दिनों का औसत 16 जहाज प्रतिदिन था। यानी मामला सिर्फ कच्चे तेल का नहीं है। इस रास्ते से दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कम होने से भारत के आयात बिल और महंगाई पर दबाव घट सकता है। हॉर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को अरब सागर और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में इस रास्ते से दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल और गैस सप्लाई गुजरती है। अगर इस रास्ते से सप्लाई सामान्य होती है और ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक नीचे रहता है, तो भारत के लिए यह राहत की खबर हो सकती है। कम तेल कीमतों से रुपये, महंगाई और कंपनियों की लागत पर भी असर पड़ सकता है।
सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार डॉ रवि सिंह के अनुसार, हॉर्मुज संकट और कच्चे तेल की कीमत लंबे समय से भारतीय शेयर बाजार के लिए अहम संकेत बने हुए हैं। अगस्त में भी बाजार विशेषज्ञों ने कहा था कि हॉर्मुज की स्थिति और ब्रेंट क्रूड की दिशा घरेलू शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेतक रहेंगे। अगर हॉर्मुज खुलने की दिशा में वास्तव में कोई ठोस प्रगति होती है और तेल की कीमतें नीचे आती हैं, तो इससे भारतीय बाजार की चिंता कुछ कम हो सकती है। हालांकि, बाजार पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमत कितनी नीचे आती है और वहां कितने समय तक बनी रहती है। सिंह ने बताया कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, पेंट कंपनियों, टायर कंपनियों और एविएशन जैसे तेल की कीमत से सीधे प्रभावित होने वाले सेक्टर्स पर भी निवेशकों की नजर रह सकती है।
डॉ रवि के अनुसार, हॉर्मुज खुलने और तेल की कीमतों में गिरावट का असर सोने पर थोड़ा अलग तरीके से पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमत कम होने से महंगाई का दबाव घट सकता है। इससे प्रमुख केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदें बदल सकती हैं। हालांकि, मौजूदा समय में सोने पर सिर्फ तेल की कीमत का असर नहीं है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव भी सोने की दिशा तय कर रहे हैं। मंगलवार को वैश्विक स्तर पर सोना करीब 0.4% गिरकर 4,327.74 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। इसलिए हॉर्मुज को लेकर किसी भी सकारात्मक खबर के बावजूद सोने में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
ईरान का सात दिन में हॉर्मुज खोलने का प्रस्ताव बाजार के लिए सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन इसे अभी अंतिम सोल्यूशन नहीं माना जा सकता। अमेरिका की तरफ से इस प्रस्ताव पर क्या कदम उठाया जाता है और दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ती है या नहीं, यह ज्यादा अहम होगा। इसके अलावा सिर्फ रास्ता खुलना ही पर्याप्त नहीं है। तेल और गैस की वास्तविक सप्लाई कितनी तेजी से सामान्य होती है, यह भी कीमतों के लिए बड़ा फैक्टर रहेगा। बाजार विशेषज्ञों ने संकेत दिया है कि तेल में आगे बड़ी गिरावट के लिए हॉर्मुज के रास्ते से सप्लाई बढ़ना जरूरी होगा।
फिलहाल बाजार की नजर तीन चीजों पर है: अमेरिका-ईरान बातचीत, हॉर्मुज से जहाजों की आवाजाही और ब्रेंट क्रूड की कीमत। इन तीनों मोर्चों पर राहत मिलती है तो भारत समेत दुनियाभर के बाजारों को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन जब तक कोई ठोस समझौता सामने नहीं आता, उतार-चढ़ाव का दौर जारी रह सकता है।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)