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आज भी काम के हैं Warren Buffett के ये टॉप-5 इन्वेस्टमेंट टिप्स, 96 की उम्र में छोड़ा Berkshire Hathaway का चेयरमैन पद

Warren Buffett Investment Tips: 96 साल के वॉरेन बफेट ने बर्कशायर हैथवे के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया है। अब उनके बेटे हावर्ड बफेट कंपनी के चेयरमैन होंगे, जबकि वॉरेन बोर्ड में डायरेक्टर और Chairman Emeritus बने रहेंगे।
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Sep 18, 2026
Warren Buffett Retirement
वॉरेन बफेट ने बर्कशायर हैथवे का चेयरमैन पद छोड़ दिया है। (PC: AI)

Warren Buffett Retirement: दुनिया के दिग्गज निवेशक वॉरेन बफेट ने बर्कशायर हैथवे के चेयरमैन पद से विदाई ले ली है। 96 साल की उम्र में लिया गया यह फैसला उनके छह दशक से ज्यादा लंबे सफर में एक बड़ा पड़ाव है। अब उनके बेटे Howard Buffett कंपनी के चेयरमैन होंगे। वॉरेन बफेट हालांकि कंपनी से पूरी तरह अलग नहीं हुए हैं। वे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में बने रहेंगे और Chairman Emeritus की भूमिका निभाएंगे।

बफेट ने 18 सितंबर 2026 को शेयरधारकों को लिखे पत्र में कहा कि उन्होंने 1965 से बर्कशायर की सर्विस की है और छह दशक से ज्यादा समय बाद भी उन्हें अपना काम दुनिया का सबसे अच्छा काम लगता है। उन्होंने यह भी लिखा कि कंपनी के अगले दौर को लेकर वे पहले से ज्यादा आश्वस्त हैं।

अब अगली पीढ़ी के हाथों में कंपनी

बफेट ने बर्कशायर हैथवे को एक संघर्ष कर रही टेक्सटाइल कंपनी से करीब 1.03 ट्रिलियन डॉलर के विशाल कारोबारी ग्रुप में बदल दिया। कंपनी के कारोबार में बीमा, रेलवे, एनर्जी, रिटेल और कई दूसरे सेक्टर्स शामिल हैं। बर्कशायर के पास GEICO, BNSF Railway, Berkshire Hathaway Energy और Dairy Queen जैसे कारोबार हैं। कंपनी ने हावर्ड बफेट को नया चेयरमैन बनाया है। Howard 1993 से बर्कशायर के बोर्ड में हैं। वॉरेन बफेट ने अपने पत्र में कहा कि Greg Abel कंपनी चलाएंगे, जबकि हावर्ड कंपनी के कल्चर और वैल्यूज की देखरेख करेंगे। इससे पहले बफेट ने सीईओ की जिम्मेदारी Greg Abel को सौंप दी थी। यानी बर्कशायर में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। अब चेयरमैन पद का बदलाव भी पूरा हो गया है।

'फादर टाइम ऑलवेज विन', बफेट ने क्यों कही ये बात?

अपने पत्र में बफेट ने उम्र को लेकर बेहद सीधी बात कही। उन्होंने लिखा कि आखिरकार समय की जीत होती है, लेकिन उनके मामले में समय ने काफी उदारता दिखाई और उन्हें बर्कशायर को इस मुकाम तक पहुंचते देखने का मौका दिया। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी अब मजबूत हाथों में है और वह आगे भी बर्कशायर के शेयरधारक बने रहेंगे। बर्कशायर के सीईओ ने कहा कि कंपनी पर बफेट का प्रभाव अमेरिकी कारोबार के इतिहास में बेजोड़ रहा है।

बफेट की सबसे बड़ी सीख क्या रही?

वॉरेन बफेट की खासियत सिर्फ यह नहीं रही कि उन्होंने बड़ी कंपनियों में निवेश किया। उनकी असली पहचान उनकी निवेश की सोच रही है। वे छोटी अवधि के उतार-चढ़ाव के बजाय लंबे समय में किसी कारोबार की क्षमता देखने पर जोर देते रहे हैं। उनकी यही सोच कई पीढ़ियों के निवेशकों और कॉरपोरेट लीडर्स के लिए मिसाल बनी। बफेट बाजार की रोजाना की हलचल को लेकर ज्यादा परेशान होने के बजाय अच्छे कारोबार को सही कीमत पर लंबे समय तक रखने के पक्षधर रहे हैं। उनके पुराने बयानों में बाजार को लेकर रोजाना भविष्यवाणी करने से बचने और लंबी अवधि पर ध्यान देने की बात बार-बार सामने आती है।

बफेट के टॉप-5 इन्वेस्टमेंट टिप्स, जो आज भी काम के हैं

  1. बाजार का सही समय पकड़ने की कोशिश न करें

बफेट लंबे समय से कहते रहे हैं कि उन्हें नहीं पता कि शेयर बाजार अगले हफ्ते, अगले महीने या अगले साल किस दिशा में जाएगा। इसलिए केवल बाजार की अगली चाल का अनुमान लगाकर निवेश रोक देना उनकी रणनीति नहीं रही है। उनकी सोच साफ है। अगर किसी अच्छे कारोबार की कीमत उचित है और निवेश का मकसद लंबी अवधि का है तो रोजाना के उतार-चढ़ाव के पीछे भागने के बजाय अनुशासन बनाए रखना ज्यादा जरूरी है।

  1. बाजार में गिरावट को सिर्फ खतरे की तरह न देखें

शेयर बाजार में गिरावट देखकर बहुत से निवेशक घबरा जाते हैं। बफेट की सोच इससे अलग रही है। उनके मुताबिक अच्छी कंपनियों के शेयर अगर बाजार की घबराहट में सस्ते मिल रहे हों तो गिरावट निवेश के मौके भी बना सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर गिरते शेयर को खरीद लेना चाहिए। कंपनी का कारोबार, कर्ज, कमाई और वैल्यूएशन देखना उतना ही जरूरी है।

  1. निवेश को जरूरत से ज्यादा जटिल न बनाएं

बफेट की निवेश शैली का एक अहम हिस्सा सादगी है। वह ऐसे कारोबारों को प्राथमिकता देने की बात करते रहे हैं जिन्हें निवेशक समझ सके और जिनके लंबे समय तक अच्छा परफॉर्म करने की संभावना हो। साधारण निवेशक के लिए भी इसका मतलब यही है कि हर दिन नए शेयर खोजने या हर बाजार हलचल पर पोर्टफोलियो बदलने के बजाय अपनी रणनीति स्पष्ट रखी जाए।

बफेट ने कई मौकों पर लो कॉस्ट इंडेक्स फंड को सामान्य निवेशकों के लिए उपयोगी विकल्प बताया है। उन्होंने अपनी वसीयत में भी अपनी पत्नी के लिए 90% राशि लॉ कोस्ट S&P 500 इंडेक्स फंड और 10% शॉर्ट टर्म सरकारी बॉन्ड में रखने का निर्देश दिया था।

भारत में इसी तरह की इंडेक्स आधारित सोच Nifty 50, Nifty 500 या BSE 500 जैसे इंडेक्स से समझी जा सकती है। हालांकि, अमेरिकी और भारतीय बाजार एक जैसे नहीं हैं।

  1. जितनी जल्दी शुरुआत, उतना ज्यादा कंपाउंडिंग का फायदा

बफेट ने 11 साल की उम्र में अपना पहला शेयर खरीदा था। उस शुरुआती अनुभव से उन्हें एक बात जल्दी समझ आ गई थी कि निवेश में समय बहुत बड़ा हथियार है। यही वजह है कि लंबी अवधि के निवेश में कंपाउंडिंग को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है। समय बढ़ने के साथ कंपाउंडिंग का असर और बड़ा हो सकता है। हालांकि, वास्तविक निवेश रिटर्न तय नहीं होता और बाजार आधारित निवेश में नुकसान की संभावना भी रहती है।

  1. बाजार को लेकर हमेशा डर में न रहें

बफेट का निवेश इतिहास इस बात का उदाहरण है कि बाजार में उतार-चढ़ाव हमेशा बने रहते हैं। उन्होंने कई बार यह बात रखी कि किसी देश की अर्थव्यवस्था और उसकी कंपनियां लंबे समय में आगे बढ़ सकती हैं, भले ही बीच में बाजार में बड़ी गिरावट क्यों न आए। इस सोच का मतलब यह नहीं है कि हर समय बाजार ऊपर ही जाएगा। बल्कि संदेश यह है कि निवेश का नजरिया कुछ दिनों या महीनों की जगह कई सालों का हो तो छोटी अवधि की उथल-पुथल को अलग नजर से देखा जा सकता है।

(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)

Updated on:
18 Sept 2026 06:01 pm
Published on:
18 Sept 2026 05:17 pm