चेन्नई

प्राप्त राशि से कर रहे गरीबों की सेवा

गुजरात व राजस्थान का बेजोड़ समन्वय ‘गुजराज’ में -गरबा व डांडिया के जरिए जोड़ रहे दोनों प्रदेशों की संस्कृति को
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Updated: 13 Oct 2018, 1:16 PM IST
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प्राप्त राशि से कर रहे गरीबों की सेवा

चेन्नई. राजस्थान मूल के तीन प्रवासियों एवं गुजरात मूल के तीन प्रवासियों ने करीब आठ साल पहले ‘गुजराज’ नामक संस्था का गठन किया। उद्देश्य यही था कि दोनों प्रदेशों की संस्कृति को करीब से जाना जा सके। इसके माध्यम से हर साल गरबा एवं डांडिया के आयोजन का निर्णय लिया गया। अब यह आयोजन विशाल रूप ले चुका है। महानगर में नवरात्रि के दिनों में बड़े आयोजनों में से एक गुजराज का यह महोत्सव अब काफी प्रसिद्धि हासिल कर चुका है और हर किसी की इच्छा इसमें प्रतिभागी बनने की रहती है।
खास बात यह है कि प्रति वर्ष गरबा एवं डांडिया महोत्सव से प्राप्त होने वाली पूरी राशि गरीबों के हितार्थ काम में ली जा रही है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि जिसे मदद दी जाती है उसके नाम का खुलासा भी नहीं किया जाता ताकि मदद मिलने वाले के मन में किसी तरह की कोई हीन भावना न रहे। इस संस्था की ओर से पहले एक्सप्रेस एवेन्यू परिसर में गरबा व डांडिया का आयोजन किया जाता था और इस बार पेरम्बूर इलाके के एसपीआर सिटी में यह आयोजन हो रहा है।
राजस्थान एवं गुजरात मूल के छह युवाओं दिलीप चंदन, भावेश पारीख, भाविन दवे, ललित भूतड़ा, जयेश सुराणा व वीरेश मेहता ने आठ साल पहले ‘गुजराज’ नामक संस्था का बीज बोया। अब इस संस्था के माध्यम से गुजरात एवं राजस्थान की संस्कृतियों का मिलन हो चुका है। खासकर नवरात्र के नौ दिनों में दोनों प्रदेशों की संस्कृति को करीब से जानने व समझने का अवसर मिल रहा है। सामाजिक सौहार्द एवं एकता की इससे बड़ी मिसाल शायद कोई दूसरी नहीं मिल सकती।
संस्थान के सदस्यों का कहना है कि नई जनरेशन की गरबा एवं डांडिया में विशेष रुचि रहती है। बच्चे भी उत्साह दिखाते हैं तो बड़े भी चाव से गरबा खेलते हैं। प्रतिदिन करीब डेढ़ से दो हजार लोग गरबा व डांडिया खेलने एवं देखने के लिए पहुंच रहे हैं। हर दिन बच्चों एवं बड़ों के लिए कई तरह की इनामी प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जा रहा है।
गरबा गुजरात एवं राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है जिसका मूल उद्गम गुजरात है। गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के दौरान गरबा महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गुजरात में नवरात्रि उत्सव की धूम रहती है और गुजराज संस्था के माध्यम से उसी रूप से यहां दक्षिण में देखा जा सकता है। यहां इस उत्सव को गरबा एवं डांडिया के रूप में मनाया जाता है। गुजरात के गरबा का खास अंदाज है जो यहां दक्षिण में भी साफ दिखता है। माता को मनाने एवं अपनी आस्था प्रकट करने का सबसे सशक्त माध्यम गरबा है।
देश की धडक़न
संस्था के दिलीप चंदन कहते हैं, गरबे की कहने को शुरुआत गुजरात से हुई लेकिन अब पूरे देश की धडक़न बन चुका है। गुजराती गीतों पर आधारित गरबा किसी जाति-धर्म को नहीं देखता। माता की भक्ति एवं आस्था की उमंग अब इसकी पहचान बन गई है। उत्साह, उमंग एवं भक्ति के रंग में रंगे प्रतिभागियों का संगम यहां देखने को मिलता है। बच्चे बड़े सभी एक ही जगह पारम्परिक वेशभूषा में डांडिया पर थिरकते यहां नजर आते हैं। संगीतमय इस आयोजन के माध्यम से मां अम्बे की भक्ति देखते ही बनती है।

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13 Oct 2018, 1:16 PM IST
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