ग्लूकोमा को साइलेंट थीफ ऑफ साइट यानी दृष्टि का खामोश चोर कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह बीमारी धीरे-धीरे और बिना किसी दर्द के आंखों की रोशनी खत्म कर देती है।
आंखों की गंभीर और लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी ग्लूकोमा, जिसे आम भाषा में काला मोतियाबिंद कहा जाता है, छतरपुर जिले में तेजी से पांव पसार रही है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में अकेले जिला अस्पताल में ही ग्लूकोमा के लगभग 200 मरीजों का सफल ऑपरेशन किया जा चुका है। इस बीमारी की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय दृष्टिहीनता नियंत्रण कार्यक्रम के तहत 14 मार्च तक पूरे जिले में विश्व ग्लूकोमा सप्ताह मनाया जाएगा, जिसमें मरीजों की निशुल्क स्क्रीनिंग और जांच की जाएगी।
जिला नोडल अधिकारी डॉ. जीएल अहिरवार ने बताया कि ग्लूकोमा को साइलेंट थीफ ऑफ साइट यानी दृष्टि का खामोश चोर कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह बीमारी धीरे-धीरे और बिना किसी दर्द के आंखों की रोशनी खत्म कर देती है। इसमें आंख के अंदर का दबाव बढऩे से दिमाग तक संकेत पहुंचाने वाली ऑप्टिक नर्व' (दृष्टि नस) क्षतिग्रस्त हो जाती है। यदि सही समय पर इसका पता न चले, तो मरीज स्थाई रूप से अंधापन का शिकार हो सकता है।
डॉक्टरों के अनुसार 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को इसका सबसे अधिक जोखिम रहता है। लक्षणों की बात करें तो शुरुआत में इसके कोई संकेत नहीं मिलते, लेकिन धीरे-धीरे किनारों से दिखना कम होना, नजर धुंधली होना, बार-बार चश्मे का नंबर बदलना, तेज सिरदर्द या आंखों में लाली आना इसके प्रमुख लक्षण हो सकते हैं।
1. मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों को।
2. जिनके परिवार में पहले से किसी को काला मोतियाबिंद रहा हो (आनुवंशिकता)।
3. उच्च रक्तचाप या आंखों में पहले लगी किसी चोट के कारण।
विश्व ग्लूकोमा सप्ताह के दौरान जिले के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेष स्क्रीनिंग कैंप आयोजित किए जाएंगे। इन कैंपों में प्राथमिक जांच के बाद जिन मरीजों में ग्लूकोमा के लक्षण पाए जाएंगे, उन्हें आगे के इलाज के लिए जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाएगा। जिला अस्पताल में मरीजों के लिए निशुल्क जांच, आई ड्रॉप्स और सर्जरी की सुविधा उपलब्ध है।
ग्लूकोमा से छिनी हुई रोशनी को दोबारा वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन समय पर इलाज शुरू करके बची हुई रोशनी को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग रैलियों, ट्रेनिंग प्रोग्राम और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहा है। डॉ. अहिरवार ने अपील की है कि 40 वर्ष की आयु पार कर चुके लोग कम से कम साल में एक बार अपनी आंखों की जांच जरूर कराएं।