छतरपुर

ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में उम्मीद की हरी चादर, छतरपुर का यह अकेला महावृक्ष न सिर्फ हवा को कर रहा शुद्ध, बल्कि तीन वार्डों के भूजल स्तर को भी दे रहा नई जिंदगी

कड़ा की बरिया मोहल्ले में खड़ा एक 400 साल पुराना विशालकाय बरगद का पेड़ आज भी एक सजग और कर्मठ प्रहरी की तरह न सिर्फ इंसानों को जीवनदायिनी सांसें दे रहा है, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण तंत्र को अकेले ही संभाले हुए है।

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Jun 06, 2026
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कड़ा की बरिया का बरगद का पेड़

एक तरफ जहां कांक्रीट के जंगलों के बढ़ते जाल, अंधाधुंध कटाई और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण देश के कई हिस्से भीषण गर्मी और जलसंकट से जूझ रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल के छतरपुर शहर से विश्व पर्यावरण दिवस पर एक ऐसी सुखद और प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जो हमें प्रकृति की असीम शक्ति का अहसास कराती है। शहर के ऐतिहासिक कड़ा की बरिया मोहल्ले में खड़ा एक 400 साल पुराना विशालकाय बरगद का पेड़ आज भी एक सजग और कर्मठ प्रहरी की तरह न सिर्फ इंसानों को जीवनदायिनी सांसें दे रहा है, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण तंत्र को अकेले ही संभाले हुए है।

यह ऐतिहासिक महावृक्ष अपने आप में कुदरत का एक अनूठा चमत्कार है। इसका आकार इतना विशाल और भव्य है कि इसके सामने आसपास के अन्य सभी पेड़ बौने नजर आते हैं। स्थानीय बुजुर्गों और वन विभाग के जानकारों का मानना है कि इस पेड़ की घनी और विशाल जटाएं तथा फैली हुई शाखाएं आज के समय में पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी मिसाल हैं।

30 हजार की आबादी के लिए ऑक्सीजन बैंक

आज के दौर में जहाँ बड़े-बड़े शहरों में शुद्ध हवा के लिए लोग तरस रहे हैं और ऑक्सीजन पार्लर खुल रहे हैं, वहीं छतरपुर का यह अकेला बरगद का पेड़ शहर के तीन प्रमुख वार्डों—वार्ड नंबर 27, 28 और 29 के निवासियों के लिए एक प्राकृतिक और मुफ्त ऑक्सीजन बैंक बना हुआ है। इस पूरे क्षेत्र की लगभग 30 हजार से अधिक की आबादी को यह पेड़ चौबीसों घंटे शुद्ध और प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान करता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस इलाके की हवा में एक अलग ही ताजगी महसूस होती है, जिसका मुख्य कारण इस महावृक्ष का निरंतर श्वसन चक्र है।

भूजल स्तर का रक्षक- तीन वार्डों में कभी नहीं गहराया जल संकट

इस बरगद के पेड़ की सबसे बड़ी खूबी इसका जल प्रबंधन तंत्र है। शहर के अन्य हिस्सों में जहां गर्मी आते ही वाटर लेवल सैकड़ों फीट नीचे चला जाता है और कुएं-बोरवेल सूख जाते हैं, वहीं इस पेड़ के प्रभाव वाले तीनों वार्डों में भूमिगत जलस्तर हमेशा यथावत बना रहता है। इस महावृक्ष की जड़ें जमीन के भीतर लगभग 200 से 300 मीटर के दायरे में फैली हुई हैं, जो बारिश के पानी को सहेजकर सीधे पाताल तक पहुंचाने का काम करती हैं। यही वजह है कि यहां के कुएं और बावडिय़ां भीषण गर्मी में भी पानी से लबालब भरे रहते हैं। क्षेत्र के लोगों को कभी भी टैंकरों या सरकारी पेयजल सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

इतिहास और पुरखों की विरासत- कड़ा परिवार की अनमोल गाथा

इस पेड़ का इतिहास छतरपुर के राजा-महाराजाओं के जमाने से जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि सदियों पहले इस महावृक्ष को कड़ा परिवार के पूर्वजों ने बड़ी उम्मीदों के साथ रोपा था। समय बीतने के साथ यह पेड़ इतना विशाल हो गया कि इस पूरे मोहल्ले की पहचान ही इस पेड़ के नाम पर कड़ा की बरिया पड़ गई। एक जमाना था जब इस पेड़ की विशाल छांव तले बड़ी संख्या में सामूहिक विवाह और सामाजिक पंचायतें आयोजित की जाती थीं। आज भी यह पेड़ क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक बना हुआ है।36 वर्षीय स्थानीय निवासी ममता कड़ा बताती हैं यह पेड़ केवल लकडिय़ों और पत्तों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की जीवंत स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है। हमारे पुरखों ने इसे लगाया था और आज इसी की बदौलत हमारे पूरे मोहल्ले को सम्मान के साथ जाना जाता है। हम इसकी पूजा करते हैं और इसे अपने परिवार के बुजुर्ग की तरह मानते हैं।मोहल्ले के ही 75 वर्षीय बुजुर्ग जयजयराम शुक्ला अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि वे जब से होश संभाले हैं, इस पेड़ को इसी तरह विशाल और हरा-भरा देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस पेड़ की शाखाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि यदि समय-समय पर सुरक्षा के लिहाज से इनकी छंटाई न की जाए, तो यह पेड़ आधे शहर को अपनी गोद में ले सकता है।

जमीन के नीचे समाया है एक और शहर

इस महावृक्ष की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भी इस क्षेत्र में नए मकानों के निर्माण के लिए नींव की खुदाई की जाती है, या जब ऐतिहासिक कोतवाली का निर्माण कार्य चल रहा था, तब जमीन के कई फीट नीचे इस बरगद की विशाल और मजबूत जड़ें पाई गईं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीन के ऊपर जितना बड़ा यह पेड़ दिखाई देता है, जमीन के नीचे भी इसका उतना ही मजबूत और विस्तृत साम्राज्य फैला हुआ है, जो पूरे इलाके की मिट्टी को जकड़े हुए है।

आयुर्वेद और विज्ञान का अद्भुत संगम,लंबी आयु का रहस्य

वन विभाग के रेंजर रजत तोमर बताते हैं कि आमतौर पर एक स्वस्थ बरगद के पेड़ की आयु 500 से 1000 वर्ष तक होती है। इस लिहाज से छतरपुर का यह पेड़ अभी अपनी उम्र के आधे पड़ाव (400 वर्ष) पर है और आने वाली कई पीढिय़ों को जीवन देता रहेगा।औषधीय गुणों का खजाना- आयुर्वेद में बरगद (वट वृक्ष) को अत्यंत पूजनीय और औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। इसकी छाल, पत्तियां और दूध कई तरह की असाध्य बीमारियों के इलाज में कारगर साबित होते हैं।प्राकृतिक वातानुकूलन- बुजुर्गों के अनुसार गर्मियों के दिनों में जब पूरे शहर में चिलचिलाती धूप और लू चलती है, तब इस पेड़ के नीचे आने पर तापमान 3 से 5 डिग्री तक कम महसूस होता है। यहां की कुदरती छांव थके हुए राहगीरों और पशु-पक्षियों के लिए एक बेहतरीन आश्रय स्थल है।

वैश्विक संकट के दौर में छतरपुर का संदेश

विश्व पर्यावरण दिवस पर छतरपुर का यह 400 साल पुराना बरगद हमें बहुत बड़ा संदेश देता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों द्वारा दूरदर्शिता के साथ लगाया गया एक सही पौधा, आने वाली सदियों और कई पीढिय़ोंं के अस्तित्व को बचाए रख सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम इस धरोहर से सीख लें और इस गर्मी के मौसम में अपने आस-पास कम से कम एक ऐसा पौधा जरूर लगाएं जो भविष्य में एक नया महावृक्ष बनकर मानवता की सेवा कर सके।

Published on:
06 Jun 2026 10:52 am
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