
पर्यावरण संरक्षण और मातृ-शक्ति को सम्मान देने के उद्देश्य से शुरू किए गए एक पेड़ मां के नाम महाभियान और अंकुर अभियान को छतरपुर में स्थानीय प्रशासन की घोर लापरवाही ने केवल फोटो-ऑप (तस्वीरें खिंचाने) का जरिया बना दिया है। सरकारी फाइलों में दर्ज लाखों रुपयों के खर्च और हरियाली के दावों के उलट, धरातल पर रोपे गए करीब 70 से 71 प्रतिशत पौधे पानी और रखरखाव के अभाव में दम तोड़ चुके हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि हजारों पौधों को सुखाने के बाद अब नगर पालिका प्रशासन अपनी कमियों को छिपाने के लिए उन्हीं स्थानों पर दोबारा पौधारोपण करने के नाम पर लाखों का नया बजट फूंकने की तैयारी में है।
शहर के नौगांव रोड स्थित वार्ड क्रमांक-1 की साधनगढ़ कॉलोनी में विकसित किया गया फल उद्यान पार्क प्रशासनिक संवेदनहीनता की सबसे बड़ी कहानी बयां कर रहा है। अगस्त 2025 में एक बड़े उत्सव के रूप में कलेक्टर, जनप्रतिनिधियों और नगर पालिका के आला अधिकारियों ने कैमरों की चमक के बीच इस 4 एकड़ के पार्क में करीब 14 हजार पौधे रोपे थे। इनमें आम, अमरूद, जामुन और नींबू जैसे फलदार पौधे शामिल थे।
इस उद्यान में करीब 3 हजार फलदार पौधे अलग से चिह्नित थे, जिनमें से 60 प्रतिशत से अधिक पूरी तरह सूख चुके हैं। वहीं, जमीनी हकीकत यह है कि कुल 14 हजार पौधों में से लगभग 71 प्रतिशत (10 हजार पौधे) सिंचाई की उचित व्यवस्था न होने से ठूंठ बन गए हैं। इस विशाल 4 एकड़ के पार्क को बिना किसी ठोस कार्ययोजना के केवल एक बोरवेल के भरोसे छोड़ दिया गया था। भीषण गर्मी में जब उसका जलस्तर गिरा, तो बूंद-बूंद पानी को तरस कर पौधे सूख गए। अब जब पौधे लकड़ी में तब्दील हो चुके हैं, तब नगर पालिका अध्यक्ष ज्योति चौरसिया वहां पानी की टंकी बनवाने का दावा कर रही हैं।
छतरपुर नगर पालिका ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान विभिन्न अभियानों के तहत लगभग 41 हजार पौधे लगाने के लिए करीब 23 लाख रुपए की सरकारी राशि खर्च की थी। इस राशि से पौधों की खरीदी, गड्ढों की खुदाई और मिट्टी भराई की गई, जिसमें प्रति पौधा औसतन 50 से 60 रुपए का खर्च आता है। इतना ही नहीं, वर्ष 2021 से 2025 के बीच भी शहर में 30 हजार पौधों की खरीदी और रोपण पर भारी बजट ठिकाने लगाया जा चुका है।
इसके बावजूद शहर के प्रमुख पार्क, फूलादेवी मंदिर टंकी क्षेत्र, गौरैया रोड स्थित मल्टी स्टोरी परिसर, पचेर घाट, देरी रोड पार्क और बूझा बांध जैसे क्षेत्रों में किए गए पौधारोपण का आज कोई वजूद नजर नहीं आता। उचित ट्री-गार्ड और नियमित खाद-पानी न मिलने से अधिकांश स्थानों पर केवल सूखी जमीन बची है।
लापरवाही का एक और बड़ा उदाहरण पन्ना रोड स्थित कचरा प्रसंस्करण केंद्र की पहाड़ी और कवर्ड क्षेत्र में देखने को मिला। यहां की पथरीली भूमि पर बिना किसी वैज्ञानिक मूल्यांकन के करीब 14 हजार पौधों का रोपण एक-दूसरे के बेहद पास-पास कर दिया गया। रोपण के बाद प्रशासन इन पौधों को भूल गया; इन्हें न तो नियमित पानी मिला और न ही खाद। परिणाम यह हुआ कि आज पहाड़ी पर पौधों की जगह सिर्फ खरपतवार और खाली गड्ढे नजर आ रहे हैं। यही हाल कचरा केंद्र के ठीक सामने स्थित अमलतास कॉलोनी के पार्कों का भी हुआ, जहां हरियाली पूरी तरह गायब हो चुकी है।
नियमों के मुताबिक, अंकुर अभियान के तहत लगाए गए पौधों की तस्वीरें सरकारी प्रगति पोर्टल पर अपलोड की गई थीं। लेकिन प्रशासन की लापरवाही के कारण पौधे कुछ ही समय में नष्ट हो गए, जिससे पोर्टल पर उनके जीवित रहने या बढऩे की बाद की प्रगति दर्ज ही नहीं हो सकी।
हजारों पौधों की असमय मौत के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई करने के बजाय, नगर पालिका अब एक नया वित्तीय खेल खेलने जा रही है। हाल ही में हुई पीआईसी की बैठक में 20 लाख रुपए की लागत से दोबारा नए पौधों की खरीदी और उन्हें बचाने के लिए 20 लाख रुपए के नए ट्री-गार्ड खरीदने की प्रशासनिक स्वीकृति दे दी गई है। यानी कुल 40 लाख रुपए का नया बजट उन्हीं स्थानों पर फूंकने की तैयारी है, जहां पिछले साल 23 लाख रुपए के पौधे सुखा दिए गए थे। इस संबंध में नगर पालिका छतरपुर के एई देवेंद्र धाकड़ का कहना है कि जिन स्थानों पर पौधे सूख गए हैं, वहां दोबारा पौधे लगाए जाएंगे और इस बार उन्हें सुरक्षित करने के लिए ट्री-गार्ड की व्यवस्था भी की जा रही है।
यह पूरी स्थिति छतरपुर प्रशासन की अदूरदर्शिता को उजागर करती है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब सिंचाई और सुरक्षा की कोई ठोस व्यवस्था (जैसे ड्रिप इरिगेशन या पानी के पर्याप्त स्रोत) पहले से तय नहीं थी, तो लाखों रुपए के पौधे खरीदकर उन्हें मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया? क्या पर्यावरण अभियानों की सफलता सिर्फ कागजों पर आंकड़े दर्ज करने और वीआईपी तस्वीरों तक सीमित रहेगी, या पौधों को सुखाने वाले गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी? साधनगढ़ पार्क और पन्ना रोड की उजाड़ पहाडिय़ां इस बात का सबूत हैं कि जब तक धरातल पर ईमानदारी से काम नहीं होगा, तब तक सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपए इसी तरह कागजी हरियाली के नाम पर बहते रहेंगे।