छतरपुर

केन-बेतवा जुड़ाव में विभागीय सुस्ती उजागर: छह हजार हेक्टेयर पन्ना बाघ अभयारण्य की जमीन का हस्तांतरण नहीं करा पाए अधिकारी, बांध निर्माण अटका

एक तरफ जहां केंद्र सरकार इस कार्य योजना को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखती है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी इस योजना को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं।
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Jul 10, 2026
ken betwa
केन-बेतवा लिंक परियोजना

देश की सबसे महत्वाकांक्षी और बहुप्रतीक्षित जल परियोजना केन-बेतवा जुड़ाव कार्य योजना विभागीय सुस्ती, लालफीताशाही और घोर लापरवाही के चक्रव्यूह में फंस गई है। बुंदेलखंड की प्यास बुझाने और इस पिछड़े इलाके की तकदीर बदलने के दावे के साथ शुरू हुई इस महा योजना की जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है। एक तरफ जहां केंद्र सरकार इस कार्य योजना को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखती है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी इस योजना को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं।

ताजा मामला यह है कि मुख्य आधार यानी ढोडऩ बांध के निर्माण के लिए जरूरी पन्ना बाघ अभयारण्य का छह हजार एक सौ सत्रह हेक्टेयर से अधिक का मुख्य क्षेत्र (वन भूमि) आज तक जिम्मेदार अधिकारी राजस्व विभाग को हस्तांतरित नहीं करा सके हैं। वन भूमि का वैधानिक हस्तांतरण न होने के कारण धरातल पर बांध निर्माण का काम पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है, जिससे कार्य योजना की लागत और समय दोनों बढऩे की आशंका गहरा गई है।

वन स्वीकृति की शर्तों का खुला उल्लंघन, फाइलों में दबी रहीं चेतावनियां

सरकारी दस्तावेजों की बारीक पड़ताल से साफ हुआ है कि इस संवेदनशील महा योजना को पर्यावरण, पारिस्थितिकी और वन्यजीव सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दो चरणों में मंजूर किया गया था। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा मई 2017 में प्रथम चरण और अक्टूबर 2023 में द्वितीय चरण की वन वैधानिक स्वीकृति दी गई थी।

इन मंजूरियों के साथ केंद्र सरकार और वन्यजीव बोर्ड ने कई ऐसी अनिवार्य शर्तें रखी थीं, जिनका पालन एक निश्चित समय सीमा के भीतर किया जाना था। इन शर्तों में पन्ना बाघ अभयारण्य के प्रभावित मुख्य क्षेत्र के बदले दूसरी जगह उतनी ही जमीन का प्रबंधन, वन्यजीवों के आने-जाने वाले रास्तों की सुरक्षा और विस्थापित होने वाले गांवों के पुनर्वास की स्पष्ट रूपरेखा शामिल थी। लेकिन आरोप है कि जल संसाधन विभाग और इस कार्य से जुड़े आला अधिकारियों ने इन शर्तों को पूरा कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। नतीजा यह हुआ कि घने जंगल की इस बेशकीमती जमीन का कानूनी हस्तांतरण अटक गया और जमीनी स्तर पर काम शुरू होने से पहले ही कानूनी अड़चनों में उलझ गया।

करोड़ों का बजट, फिर भी कछुआ चाल

विशेषज्ञों का कहना है कि केन-बेतवा जुड़ाव योजना के तहत बनने वाले ढोढन बांध से बुंदेलखंड के छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना सहित उत्तर प्रदेश के कई जिलों को सिंचाई और पीने का पानी मिलना है। इस पूरी योजना के लिए केंद्र सरकार ने भारी-भरकम बजट भी स्वीकृत किया है। इसके बावजूद, विभागों के आपसी तालमेल की कमी और अधिकारियों की उदासीनता के कारण काम कछुआ गति से चल रहा है। पन्ना बाघ अभयारण्य के वन्यजीवों, विशेषकर बाघों के इस संवेदनशील रहवास क्षेत्र को लेकर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का पालन करने में भी ढिलाई बरती गई, जिससे मामला और पेचीदा हो गया है।

अधिकारियों का दावा और जमीनी विरोधाभास

इस पूरे गंभीर मामले और प्रशासनिक विफलता पर जब संबंधित विभाग का पक्ष लिया गया, तो उन्होंने मामले की गंभीरता को कम करते हुए इसे एक सामान्य और प्रक्रियात्मक देरी बताने की कोशिश की।

इनका कहना हैवन की जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया लगभग अंतिम दौर में है। अब एक हजार हेक्टेयर से भी कम का क्षेत्र शेष बचा है, जिसे कागजी कार्रवाई पूरी कर जल्द ही हस्तांतरित कर लिया जाएगा। काम में कोई बड़ी रुकावट नहीं है।

उमा गुप्ता, प्रभारी कार्यपालन यंत्री, केन-बेतवा लिंक परियोजना

Updated on:
10 Jul 2026 10:39 am
Published on:
10 Jul 2026 10:38 am
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