
ढड़़ारी गांव में अमर कुशवाहा का शौचालय
जिले में हाल ही में संपन्न हुए जनगणना के प्रथम चरण के मकान सूचिकरण कार्य ने कई ऐसे तथ्य सामने ला दिए हैं, जो विभिन्न शासकीय योजनाओं के दावों की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं. 30 मई तक चले इस सर्वे में जिले के 3,689 मकान सूचिकरण ब्लॉकों में कुल 6 लाख 41 हजार 553 मकानों का रिकॉर्ड तैयार किया गया है। यह संख्या प्रारंभिक अनुमानों से अधिक पाई गई है. हालांकि, विकास के इन बड़े आंकड़ों की चमक के पीछे जिले के ग्रामीण इलाकों में मूलभूत सुविधाओं और जमीनी हकीकत की स्थिति बेहद चिंताजनक है. बरसों पहले कागजों पर खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित हो चुके इस जिले में आज भी लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।
मकान सूचिकरण के अंतर्गत प्रगणकों ने घर-घर पहुंचकर मकानों की स्थिति, उपलब्ध सुविधाओं और अन्य आधारभूत जानकारियों का संकलन किया है. इस सर्वे के मुख्य आंकड़े जिले में मकानों की भारी बढ़ोतरी को दर्शाते हैं।
2011 की जनगणना के आंकड़े- 15 वर्ष पहले 2011 में हुई जनगणना में जिले भर में महज 3.56 लाख मकान थे, तब जिले की कुल जनसंख्या 17 लाख 23 हजार 375 थी।
2026 की वर्तमान स्थिति- हाल ही में संपन्न हुए मकान सूचिकरण में अब मकानों की संख्या बढकऱ 6 लाख 41 हजार 553 हो गई है, जिसमें आवासीय और व्यावसायिक दोनों ही तरह के मकान शामिल हैं. इसके साथ ही जिले की अनुमानित जनसंख्या अब 23,53,014 पहुंच गई है।
बंद मकानों की संख्या- इस पूरे सर्वे के दौरान कुल 4,796 मकान ऐसे मिले जो बंद पाए गए, जिसके कारण उनकी विस्तृत जानकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की जा सकी।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत छतरपुर जिले को लेकर किए गए सरकारी दावे धरातल पर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं।
वर्ष 2019 में हुई थी घोषणा- छतरपुर जिला 2 अक्टूबर 2019 को स्वच्छ भारत मिशन के दूसरे चरण के समापन पर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया गया था। देश के अन्य जिलों के साथ छतरपुर को भी आधिकारिक तौर पर यह दर्जा मिला था।
घोषणा के बाद थमे प्रयास- आरोप है कि ओडीएफ का दर्जा मिलने के बाद इसके लिए चल रहे सारे प्रयास पूरी तरह से बंद हो गए, जिससे जमीनी स्थिति फिर से पहले जैसी ही हो गई है। सर्वे के दौरान यह बात सामने आई है कि जिले के अनेक ग्रामीण और शहरी परिवारों के घरों में अब भी शौचालय नहीं हैं।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत वर्ष 2024-25 में ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए गए शौचालयों की गुणवत्ता और निर्माण कार्य पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
घटिया निर्माण की पोल खुली- जिले के डड़ारी गांव में स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाए गए शौचालयों के निर्माण पर शासन द्वारा प्रति इकाई 12 हजार रुपए खर्च किए गए थे। लेकिन निर्माण सामग्री की गुणवत्ता कमजोर होने के कारण महज एक वर्ष के भीतर ही ये शौचालय पूरी तरह जर्जर अवस्था में पहुंच गए हैं।
क्षतिग्रस्त हुए ढांचे- डड़ारी गांव के अमर कुशवाहा और दीपक तिवारी के घरों में निर्मित शौचालय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इन शौचालयों की दीवारें और ढांचे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे ग्रामीणों का नियमित उपयोग प्रभावित हो रहा है।
शौचालयों के अनुपयोगी होने और ग्रामीणों के खुले में जाने के पीछे पानी की किल्लत एक सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आई है। जिले के गांवों में नल-जल योजनाएं संचालित होने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन पानी सप्लाई की व्यवस्था चिंताजनक है।
बूदौर गांव में 30 प्रतिशत लोग अब भी खुले में शौच को मजबूर- जिला मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित बूदौर गांव में ओडीएफ के दावों की जमीनी स्थिति साफ देखी जा सकती है. ग्रामीणों के अनुसार, गांव के लगभग 30 प्रतिशत लोग आज भी खुले में शौच के लिए जाते हैं। ग्रामीण राकेश यादव और शिवचरण यादव ने बताया कि शासन की योजना के तहत गांव के केवल आधे घरों में ही शौचालय बन सके हैं।
टंकियां बनीं पर सप्लाई ठप- गांवों में पेयजल व्यवस्था बड़ी समस्या बनी हुई है। पानी की टंकी का निर्माण कार्य अब तक पूरा नहीं हो पाया है, जिससे नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। पानी की इसी कमी के कारण लोग शौचालयों का उपयोग करने से बचते हैं। कई स्थानों पर पानी की टंकियां तो बनी हैं, लेकिन नियमित जल आपूर्ति नहीं हो रही और लोगों को दूरस्थ स्रोतों से पानी लाना पड़ रहा है।
अमीर-गरीब की खाई- ग्रामीणों का कहना है कि सक्षम परिवारों ने अपने स्तर पर निजी शौचालय बनवा लिए हैं, जबकि गरीब परिवार अब भी इस सुविधा से पूरी तरह वंचित हैं। कुछ शौचालय गांवों से दूर या खेतों में बने होने के कारण उपयोग में नहीं आ रहे हैं। ऐसी ही स्थिति ललोनी और बगौता गांवों में भी देखने को मिली है, जहां शौचालयों की उपलब्धता और उनका उपयोग दोनों ही बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
इस सर्वे में केवल स्वच्छता और पानी ही नहीं, बल्कि सरकारी ईंधन योजनाओं की हकीकत भी सामने आई है। मकान सूचिकरण के दौरान यह दुखद तथ्य भी उजागर हुआ कि जिले में बड़ी संख्या में परिवार अब भी खाना बनाने के लिए पारंपरिक साधनों पर ही निर्भर हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश घरों की रसोई में लकड़ी, कंडे और पारंपरिक ईंधन का इस्तेमाल हो रहा है, जो धुएं से मुक्ति के दावों को सीधे तौर पर झुठलाता है।
Updated on:
08 Jul 2026 10:47 am
Published on:
08 Jul 2026 10:47 am
