छतरपुर

तारीफ के काबिल जिला अस्पताल का प्रयास जहां सिर्फ 23 फीसदी सिजेरियन, पर सवाल यह कि प्राइवेट नर्सिंग होम में कदम रखते ही यह आंकड़ा 62 प्रतिशत के पार क्यों?

हाई-रिस्क और क्रिटिकल केसों को तुरंत एम्बुलेंस में लादकर सरकारी जिला अस्पताल के लिए रेफर कर देते हैं, क्योंकि जिला अस्पताल में ही ब्लड बैंक, विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम और जीवन रक्षक वेंटिलेटर जैसी आवश्यक सुविधाएं मौजूद हैं।
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Jul 07, 2026
district hospital
जिला अस्पताल

जिला अस्पताल में प्रसव के लिए आने वाली ग्रामीण और गरीब परिवारों की महिलाओं को बेहतर और सुरक्षित मातृत्व सेवाएं देने के मामले में सरकारी डॉक्टरों ने एक सराहनीय मिसाल पेश की है। स्वास्थ्य विभाग के वित्तीय वर्ष 2025-26 के ताजा और आधिकारिक आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि जिला अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा प्राकृतिक प्रसव यानी नॉर्मल डिलीवरी को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसके चलते वहां सिजेरियन (ऑपरेशन से प्रसव) की दर महज 23 प्रतिशत दर्ज की गई है। लेकिन इन सकारात्मक आंकड़ों के समानांतर निजी नर्सिंग होम और प्राइवेट अस्पतालों की जो तस्वीर सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली और गंभीर सवाल खड़े करने वाली है। प्राइवेट अस्पतालों में कदम रखते ही सिजेरियन ऑपरेशन का यह ग्राफ अप्रत्याशित रूप से बढ़कर 62 फीसदी के पार पहुंच जाता है, जो सीधे तौर पर व्यापारिक मुनाफे के खेल की ओर इशारा करता है।

बिगड़े और रेफरल केस संभालने के बाद भी सर्जरी कम

जिले के किसी भी कोने में या निजी अस्पतालों में कोई प्रसव केस अत्यधिक बिगड़ जाता है या प्रसूता की स्थिति गंभीर होती है, तो निजी नर्सिंग होम कोई भी जोखिम लेने से साफ बचते हैं। वे ऐसे हाई-रिस्क और क्रिटिकल केसों को तुरंत एम्बुलेंस में लादकर सरकारी जिला अस्पताल के लिए रेफर कर देते हैं, क्योंकि जिला अस्पताल में ही ब्लड बैंक, विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम और जीवन रक्षक वेंटिलेटर जैसी आवश्यक सुविधाएं मौजूद हैं। तमाम गंभीर और आखिरी वक्त पर आए केसों को सफलतापूर्वक संभालने के बावजूद जिला अस्पताल में ऑपरेशन की दर सिर्फ 23 प्रतिशत है, जबकि इसके विपरीत जहां केवल सामान्य और कम जोखिम वाले मरीज जाते हैं, उन निजी अस्पतालों में 62 प्रतिशत से अधिक प्रसूताओं के पेट पर चीरा लगा दिया जाता है। यह स्थिति साफ करती है कि जिला अस्पताल के डॉक्टर जहां हर संभव प्रयास करके नॉर्मल डिलीवरी कराने को प्राथमिकता दे रहे हैं, वहीं निजी केंद्रों में सामान्य मरीजों को भी डराकर ऑपरेशन टेबल पर ले जाया जा रहा है।

आर्थिक लाभ के लिए निजी अस्पतालों में 10 में से 6 महिलाओं का कर देते हैं ऑपरेशन

चिकित्सा विज्ञान और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के स्थापित मानकों के अनुसार, किसी भी सामान्य भौगोलिक आबादी में केवल 10 से 15 प्रतिशत मामलों में ही ऐसी चिकित्सीय जटिलता उत्पन्न होती है जहां सिजेरियन ऑपरेशन अनिवार्य हो। निजी नर्सिंग होम का 62 प्रतिशत का आंकड़ा चिकित्सा के मूल सिद्धांतों और प्राकृतिक नियमों के पूरी तरह खिलाफ है। इसका सीधा और कड़वा मतलब यह है कि प्राइवेट अस्पतालों में पहुंचने वाली हर 10 में से 6 से अधिक महिलाओं का ऑपरेशन कर दिया जाता है, जो प्राकृतिक रूप से मुमकिन नहीं है और केवल आर्थिक लाभ कमाने के उद्देश्य को दर्शाता है।

मोटा बिल और तगड़े कमीशन का संगठित खेल

सरकारी अस्पताल में प्रसव की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह निःशुल्क होती है, इसलिए वहां के स्टाफ या डॉक्टरों को नॉर्मल डिलीवरी कराने या ऑपरेशन करने पर कोई व्यक्तिगत वित्तीय लाभ नहीं होता। यही कारण है कि वहां चिकित्सीय आवश्यकता होने पर ही सिजेरियन किया जाता है। इसके विपरीत, निजी नर्सिंग होम में जैसे ही डिलीवरी को सिजेरियन में बदला जाता है, वैसे ही अस्पताल का बिल सीधे 30,000 से 50,000 रुपए या उससे अधिक तक पहुंच जाता है। जिला अस्पताल के भीतर सक्रिय दलालों, कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों और मरीजों को निजी केंद्रों में फुसलाकर भेजने वाले नेटवर्क को मोटा कमीशन बांटा जाता है।

पीड़ित पक्ष को लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए, जिससे कार्रवाई की जा सके

इस गंभीर मामले और विरोधाभासी आंकड़ों को लेकर जब जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. आरपी गुप्ता से बात की गई, तो उन्होंने इस प्रकार के किसी भी संगठित रैकेट की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि मामला अभी उनके संज्ञान में नहीं आया है, लेकिन यदि मरीजों को जबरन बाहर भेजा जा रहा है या डराया जा रहा है, तो पीड़ित पक्ष को विभाग के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए, जिसके बाद दोषियों के खिलाफ कड़ी वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

Updated on:
07 Jul 2026 10:49 am
Published on:
07 Jul 2026 10:49 am