
जिले की चरमराई और वेंटिलेटर पर चल रही स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के सरकारी दावे एक बार फिर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। लंबे समय से डॉक्टरों की भारी किल्लत से जूझ रहे जिला अस्पताल और ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को संजीवनी देने के लिए शासन ने डॉक्टरों की फौज तैनात तो की थी, लेकिन जमीनी हकीकत ढाक के तीन पात वाली ही है। जिले को आवंटित किए गए नए डॉक्टरों ने भी अब छतरपुर आने से मुंह मोडऩा शुरू कर दिया है, जिसके चलते अस्पतालों के कायाकल्प और उन्नयन की तमाम योजनाएं धरी की धरी रह गई हैं।
स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, जिले के अलग-अलग विकासखंडों में चिकित्सा सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए शासन द्वारा 44 नए चिकित्सा अधिकारियों की सूची जारी की गई थी। उम्मीद थी कि इन डॉक्टरों के आने से ग्रामीण अस्पतालों की सूरत बदलेगी, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से अब तक सिर्फ 30 डॉक्टरों ने ही ज्वॉइनिंग दी है। जिनमें से 14 डॉक्टर जिला अस्पताल को मिले, बाकी ग्रामीण अंचल को, जिससे ग्रामीण अंचल में स्वास्थ्य सेवा में सुधार होगा, लेकिन अभी भी डॉक्टरों की कमी है। बाकी बचे 14 डॉक्टरों ने अब तक जिले में आमद दर्ज नहीं कराई है। लंबे समय से रिक्त पड़े पदों पर इन डॉक्टरों के न आने से अब उनकी नियुक्ति को लेकर गहरा संशय पैदा हो गया है, जिससे स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
जिले भर में हर ब्लॉक पर मौजूद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो इन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रथम श्रेणी (फस्र्ट क्लास) डॉक्टरों के 44 पद स्वीकृत हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इनमें से सिर्फ दो डॉक्टर ही इस समय अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह, द्वितीय श्रेणी (सेकेंड क्लास) डॉक्टरों के स्वीकृत 79 पदों के मुकाबले केवल 40 पद ही भरे हुए हैं, यानी लगभग आधे पद खाली पड़े हैं।
चिकित्सकों के अलावा पैरामेडिकल स्टाफ की कमी भी मरीजों पर भारी पड़ रही है। एएनएम के स्वीकृत 309 पदों में से महज 210 पदों पर ही तैनाती हो सकी है। स्टाफ नर्स के मामले में 97 स्वीकृत पदों के मुकाबले 84 पदों पर ही स्टाफ मौजूद है। यदि संविदा पदों की बात करें, तो 33 स्टाफ नर्सें एवं 125 संविदा नर्सें ही पूरे जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात हैं, जिनके भरोसे जैसे-तैसे काम चलाया जा रहा है।
जिले के स्वास्थ्य केंद्रों का उन्नयन (अपग्रेडेशन) न हो पाने की सबसे बड़ी वजह यही प्रशासनिक और डॉक्टरों की बेरुखी के साथ-साथ यह भारी रिक्तियां हैं। शासन स्तर पर कागजों में तो अस्पतालों को सर्वसुविधायुक्त बनाने और वहां बेहतर ओपीडी संचालित करने के बड़े-बड़े खाके खींचे जाते हैं, लेकिन जब तक डॉक्टरों की भौतिक उपस्थिति नहीं होगी, तब तक इन केंद्रों का उन्नयन संभव ही नहीं है। वर्तमान स्थिति यह है कि बड़ामलहरा, नौगांव, राजनगर, बिजावर, ईशानगर, चंद्रनगर, चंदला, गौरिहार, बकस्वाहा और लवकुशनगर जैसे दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। नए डॉक्टरों के न आने से इन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ सेवाएं शुरू होना तो दूर, सामान्य ओपीडी का संचालन भी रामभरोसे चल रहा है।
इस पूरे सिस्टम की नाकामी का खामियाजा ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है। अंचल के अस्पतालों में डॉक्टरों की कुर्सी खाली रहने के कारण मरीजों को छोटी-मोटी बीमारियों, मौसमी बुखार या प्रसव जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर मुकम्मल इलाज और डॉक्टरों के न मिलने के कारण इन ग्रामीण अस्पतालों की स्थिति महज एक रैफरल सेंटर जैसी हो गई है, जहां से मरीजों को सीधे जिला मुख्यालय रेफर कर दिया जाता है। इससे गरीब ग्रामीणों का समय तो बर्बाद होता ही है, साथ ही इलाज के अभाव में उनकी जेब पर भी भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
बीते तीन वर्षो में जिले के अलग अलग इलाके में तीन चरणों में 49 स्वास्थ्य केंद्र भवनों का निर्माण किया गया। दो मंजिला इन भवनों में स्टॉफ के रहने की व्यवस्था भी की गई ताकि चौबीस घंटे इमरजेंसी संभाली जा सके। लेकिन डॉक्टरों व अन्य स्टॉफ की कमी के चलते इन आधुनिक भवनों का लाभ नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के 73 अस्पतालों के उन्नयन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उनका तर्क है कि जब डॉक्टर ही नहीं हो अस्पतालों का उन्नयन करने से क्या होगा।
जिले में सभी जगह तो डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का अभाव नहीं कह सकते, लेकिन कुछ जगहों पर समस्या है। शासन से पत्राचार कर समस्या का समाधान धीरे-धीरे कराया जा रहा है। स्वास्थ सुविधाओं दुरुस्त करने की कोशिश जारी है। गंभीरता से लेते हुए व्यवस्था सुधारने का प्रयास कर रहे हैं।
डॉ आरपी गुप्ता,सीएमएचओ