
जार वाला पानी
क्या आप भी हर सुबह अपने घर या दफ्तर में आने वाले पानी के नीले डिब्बे (जार) को शुद्ध पानी समझकर तसल्ली कर लेते हैं? अगर हां, तो संभल जाइए। छतरपुर शहर और जिले की रगों में हर दिन हजारों लीटर ऐसा पानी दौड़ाया जा रहा है जो आपकी सेहत को सुधारने नहीं, बल्कि बिगाड़ने का पूरा इंतजाम कर रहा है।
पूरे जिले की कड़वी हकीकत यह है कि यहां केवल 5 फैक्ट्रियों के पास वैध सरकारी अनुमति (एफएसएसएआई व बीआईएस लाइसेंस) है, जबकि 50 से ज्यादा अवैध कारखाने बिना किसी जांच के धड़ल्ले से चल रहे हैं। साफ पानी के नाम पर जनता को अमानक पानी पिलाया जा रहा है, लेकिन नियमों की तकनीकी व्याख्याओं और जांच की सुस्ती के कारण इस अवैध कारोबार पर शिकंजा नहीं कसा जा पा रहा है।
5 वैध बनाम 50 अवैध: शहर के लगभग हर मोहल्ले और कस्बों में कुकुरमुत्ते की तरह पानी के कारखाने खुल गए हैं। इन अवैध संचालकों के पास न तो कोई सरकारी अनुमति है और न ही पानी को शुद्ध करने का कोई तय पैमाना।
गंदगी के बीच आपूर्ति: जिन डिब्बों में पानी भरकर आपके घरों तक पहुंचता है, उन्हें दोबारा इस्तेमाल करने से पहले ठीक से साफ तक नहीं किया जाता। गाड़ियों में बिना ढके, धूल और तेज धूप के बीच ये डिब्बे वितरण करने वालों के जरिए शहर भर में बांटे जा रहे हैं।
पहचान छुपाने का खेल: इन बड़े डिब्बों और पन्नियों पर न तो किसी अधिकृत कंपनी का नाम दर्ज होता है, और न ही यह पता चलता है कि पानी किस तारीख को भरा गया (निर्माण तिथि) और इसे कब तक इस्तेमाल करना है (समाप्ति तिथि)।
पानी के इस काले कारोबार में जालसाजी का स्तर बेहद शातिर है। अमूमन लोग पानी की शुद्धता परखने के लिए आईएसआई मार्क देखते हैं, लेकिन अवैध कारोबारी डिब्बों पर चालाकी से भ्रामक प्रबंधन प्रमाण पत्र (जैसे फर्जी आईएसओ नंबर) छाप देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि शुद्धता का सरकारी मार्क (बीआईएस या आईएसआई) पानी की क्वालिटी और उसकी प्रयोगशाला जांच की गारंटी देता है, जबकि कंपनियों के आंतरिक प्रबंधन वाले प्रमाण पत्र केवल उनके दफ्तर के काम और कर्मचारियों की व्यवस्था को दर्शाते हैं। इसका पानी की शुद्धता से कोई लेना-देना नहीं होता। इतना ही नहीं, कुछ अवैध कारोबारी तो नामी कंपनियों के पुराने खाली डिब्बे चुराकर या औने-पौने दाम में खरीदकर, उनमें अपना अशुद्ध पानी दोबारा भर रहे हैं।
छतरपुर जिले में उंगलियों पर गिनने लायक ही ऐसी कंपनियां हैं जो खाद्य एवं औषधि विभाग में पंजीकृत हैं और जिनके पास भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) का वैध लाइसेंस है।
जलनीर (बगौता)
केएसएम कंपनी (गल्ला मंडी)
सुधा इंडस्ट्रीज (शहनाई गार्डन के पास)
श्री जटाशंकर आरओ वाटर प्लांट
बुंदेलखंड समग्र विकास संस्थान (सीटीएस माही मेलोडी पॉइंट)
इनके अलावा जिले में चल रहे बाकी 50 से ज्यादा कारखाने पूरी तरह गैर-लाइसेंसधारी हैं और शुद्धता की कसौटी पर फेल हैं।
सुरक्षित अवधि: सरकारी नियम के अनुसार डिब्बा 30 दिन, पन्नी 20 दिन, और बोतल 5 से 6 महीने के लिए सुरक्षित है। जमीनी हकीकत यह है कि यहाँ कोई तारीख दर्ज नहीं होती और महीनों पुराना पानी भी बेचा जा रहा है।
जगह और संसाधन: सरकारी नियम के अनुसार इसके लिए 1000 से 1500 वर्ग फीट जगह, पानी ठंडा करने की मशीन और बड़ा एसएस टैंक होना चाहिए। जमीनी हकीकत में तंग कमरों और गंदे बेसमेंट में सीधे बोरिंग से भरकर पूरा खेल चल रहा है।
कागजी कार्रवाई: सरकारी नियम के अनुसार एफएसएसएआई लाइसेंस, बीआईएस (आईएसआई) सर्टिफिकेशन और व्यापार कर नंबर होना अनिवार्य है। जमीनी हकीकत यह है कि बिना किसी सरकारी कागजात के चोरी-छिपे संचालन हो रहा है।
विभागीय जांच की स्थिति और जिम्मेदार अधिकारी का पक्ष
इस संवेदनशील मामले में विभागीय जांच और नियमित निगरानी को लेकर जब खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों से चर्चा की गई, तो उन्होंने इस व्यवसाय से जुड़ी कुछ व्यावहारिक और तकनीकी सीमाओं को सामने रखा। खाद्य सुरक्षा अधिकारी संतोष तिवारी का कहना है पैकेज्ड ड्रिंक वॉटर (बोतलबंद पानी) की शुद्धता और मानकों की जांच हमारे विभाग के नियमित एजेंडे में शामिल है। जहां तक 20 लीटर वाले पानी के जारों का सवाल है, तो इस श्रेणी के पानी के परिवहन, वितरण और सीलिंग से जुड़े कुछ तकनीकी और कानूनी बिंदु न्यायालय में विचाराधीन हैं। वर्तमान में हम नियमों के दायरे में रहकर लगातार इन प्लांटों की कार्यप्रणाली पर नजर रख रहे हैं। जैसे ही इस संबंध में उच्च स्तर से स्पष्ट दिशा-निर्देश या अंतिम अदालती निर्णय प्राप्त होता है, नियमों के उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ और अधिक सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
भले ही विभाग इस मामले में तकनीकी और अदालती स्पष्टता का हवाला दे रहा हो, लेकिन एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) के नियमों के अनुसार किसी भी स्वरूप में पेयजल का व्यावसायिक विक्रय बिना उचित लाइसेंस और मानकों के करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। जिले में चल रहे अवैध प्लांटों पर नियमित जांच की रफ्तार सुस्त होने के कारण अमानक पानी का यह धंधा तेजी से पैर पसार रहा है। जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए यह बेहद जरूरी है कि विभाग अपनी इस निगरानी प्रक्रिया को और अधिक तेज करे।
इस बेखौफ कारोबार को रोकने के लिए जब तक विभाग सक्रिय होकर जांच शुरू नहीं करता, तब तक जनता को खुद अपनी सेहत का रखवाला बनना होगा। पानी का डिब्बा या पन्नी लेते समय हमेशा कंपनी का अधिकृत लोगो और सील जरूर देखें। निर्माण तिथि और समाप्ति तिथि अनिवार्य रूप से जांचें। शक होने पर एफएसएसएआई या बीआईएस की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर कंपनी का लाइसेंस नंबर जरूर जांचें।
Updated on:
15 Jul 2026 11:55 am
Published on:
15 Jul 2026 11:00 am
