
जिस टूर्नामेंट ने जिले को पहचान दी, नाम दिया, एक से बढ़कर एक खिलाड़ी दिए जिन्होंने अपने हुनर और कठिन अभ्यास के दम पर जिले का नहीं, बल्कि राज्य का भी प्रतिनिधित्व किया। जो खेल छतरपुर के दिलों में बसता था आज वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। कोरोनाकाल के पांच साल होने के बाद भी जिले की पहचान कहा जाने वाला बनर्जी टूर्नामेंट पूरी तरह से बंद हो गया है। अभ्यास करने के लिए न तो मैदान बचा है और ना ही कोई जिम्मेदार टूर्नामेंट के लिए जद्दोजहद कर रहा है। जहां पूरा देश फीफा वर्ल्ड कप की तैयारी में है, वहीं छतरपुर जिले में अपनी विजयी इतिहास बनाने वाला फुटबॉल मैच अपनी पहचान खो रहा है। पुराने खिलाडि़यों का कहना है कि हम लोगों ने कठिन संघर्ष और मेहनत के दम पर फुटबॉल को आगे लाने का काम किया था। टूर्नामेंट बंद होने से उनकी लगन और संघर्ष जाया हो रहा है। प्रशासन जल्द ही टूर्नामेंट को शुरु कराए।
छतरपुर के बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम में आयोजित होने वाले टूर्नामेंट की जिम्मेदारी पहले महाराजा कॉलेज जो बाद में छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय बना, उसका प्रबंधन संभालता था। बाद में इसकी कमान नपा को सौंप दी गई। कोरोना के दौरान इस पर रोक लगाई थी, लेकिन महामारी के बाद पिछले वर्षो में स्टेडियम में चल रहे निर्माण और प्रशासनिक उदासीनता को बहाना बनाया। वर्तमान में स्टेडियम में निर्माण से जुड़ी कोई अड़चन नहीं है, इसके बाद इस साल भी आयोजन को लेकर खेल विभाग या नपा की ओर से कोई रोडमैप दिखाई नहीं दे रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जिस खेल के माध्यम से जिले को देशभर में सातवीं रैंक मिली थी उस फुटबॉल को जिला खेल विभाग में शामिल ही नहीं किया गया है। खेल विभाग ने केवल जूडो और एथलीट्स की ओर ध्यान दिया है। जबकि रैंक में फुटबॉल सबसे आगे था। खिलाडि़यों में इस हीन भावना से हताशा दिख रही है। वहीं खेल अधिकारियों का कहना है कि हमारे विभाग में फुटबॉल को शामिल नहीं किया गया है तो इसके बारे में कोई बात नहीं कर पाएंगे।
टूर्नामेंट में विजेता टीम को जो शील्ड दी जाती है, उसे एशिया की सबसे बड़ी शील्ड होने का गौरव प्राह्रश्वत है। इस ऐतिहासिक शील्ड का निर्माण तत्कालीन छतरपुर महाराज ने करवाया था। टूर्नामेंट का एक नियम है कि इस शील्ड पर कब्जा वही टीम कर सकती है, जो लगातार 3 बार फाइनल मुकाबला जीतेगी। अब तक के रिकॉर्ड में 6 बार महाराष्ट्र की टीम ने इस खिताब को अपने नाम किया है।
फुटबॉल के पुराने खिलाडि़यों का कहना है कि जिले में फुटबॉल का अलग रोमांच था, लेकिन प्रशासन की अनदेखी से उसका भविष्य दांव पर लग गया है। नए बच्चे आज यह भी नहीं जानते की शहर में कोई टूर्नामेंट भी होता था। करोड़ों की लागत से स्टेडियम तो बना है, लेकिन उसमें फुटबॉल का आयोजन न होना सबसे बड़ी हैरानी की बात लगती है। प्रशासन को आगे आकर एक बार फिर से टूूर्नामेंट का आयोजन करना चाहिए- गुलाम अली, फुटबॉल प्लेयर
प्रशासन को फुटबॉल टूर्नामेंट के लिए एक बार फिर से आगे आकर शुरुआत करनी चाहिए। जिस खेल ने शहर को पहचान दिलाई उसे इस तरह बंद होता देख तकलीफ होती है। स्वर्णिम इतिहास में फुटबॉल नाम होने के बाद भी पांच साल से टूर्नामेंट बंद हो गया है। जबकि अभी किसी प्रकार की कोई अड़चन नहीं है फिर भी टूर्नामेंट शुरु नहीं हो पाया है।अजीम शेख, फुटबॉल प्लेयरआगे बढ़ने का कोई मंच नहींटूर्नामेंट से छतरपुर को देशभर में पहचान मिली। यहीं से खेलकर कई राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी निकले हैं। टूर्नामेंट बंद होने से ग्रासरूट फुटबॉल पिछड़ गई है। स्कूलों और कॉलेजों के बच्चों को आगे बढ़ने का कोई मंच नहीं मिल रहा है। प्रशासन को इस ओर ध्नान देने की जरुरत है।
हमारा जिला छोटा है इसलिए विभाग के पास दो खेल को क्रियांवित कराने का मौका दिया गया है। जिसमें हम लोग जूडो और एथलीट्स को शामिल किए हुए हैं। फुटबॉल हमारे विभाग के अंतर्गत नहीं आता। क्लब के माध्यम से अभी जिले मेंं फुटबॉल संचालित हो रहा है। हम लोग सरकार की पॉलिसी के अनुसार ही काम कर रहे हैं।
राजेंद्र कोष्ठा, अधिकारी, खेल एवं युवा कल्याण विभाग