निकायों और पंचायतों ने राशि निकालने के बाद काम अधूरा छोड़ा है, उनके खिलाफ वसूली के आदेश जारी कर दिए गए हैं। विभाग का दावा है कि जैसे ही राशि वापस प्राप्त होगी, इन अधूरे भवनों को पूरा कराया जाएगा।
जिले के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक ऐसा चेहरा सामने आया है जिसने मासूम बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। शासन द्वारा स्कूलों के नए भवनों के निर्माण के लिए लाखों रुपये स्वीकृत किए गए, लेकिन निर्माण एजेंसियों ने काम पूरा किए बिना ही राशि का आहरण कर लिया। इसका नतीजा यह है कि आज जिले के कई स्कूल भवन खंडहर में तब्दील हो रहे हैं और सैंकड़ों छात्र जर्जर और असुरक्षित कमरों में बैठकर अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
जिले के नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल भवनों के सालों से अधूरे पड़े रहने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन भवनों के लिए बजट जारी हुआ, उनकी पूरी राशि संबंधित एजेंसियों ने निकाल ली, लेकिन काम को बीच में ही लटका दिया गया। समय बीतने के साथ ये अधूरे ढांचे अब खंडहर बनते जा रहे हैं।
राजापुरवा: लवकुशनगर क्षेत्र के वार्ड 8 में करीब 10 साल पहले 8 लाख रुपये की लागत से माध्यमिक स्कूल भवन की स्वीकृति मिली थी। नगर परिषद ने राशि तो निकाल ली, लेकिन केवल दीवारें खड़ी कर काम छोड़ दिया। आज यहां 154 छात्र-छात्राएं मात्र चार छोटे कमरों में पढ़ाई करने को विवश हैं।
चौका पंचायत- सागर रोड स्थित इस पंचायत में 14 साल पहले 6 लाख रुपए की लागत से स्कूल निर्माण शुरू हुआ था। निर्माण एजेंसी ने पूरी राशि का आहरण कर लिया, लेकिन भवन आज भी अधूरा है और इसकी दीवारें अब खुद ही गिरने लगी हैं। यहां कक्षा 1 से 8वीं तक के 135 छात्र पुराने और जर्जर भवन में बैठने को मजबूर हैं।
छतरपुर जनपद के मानपुरा गांव में भी ऐसी ही तस्वीर देखने को मिली है। वर्ष 2011-12 में 12 लाख रुपए की लागत से भवन खड़ा तो किया गया, लेकिन न तो फर्श बना, न बिजली की फिटिंग हुई और न ही टाइल्स लगाई गईं। सबसे गंभीर बात यह है कि भवन की छत इतनी कमजोर है कि बारिश के दौरान पानी सीधा कमरों में टपकता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई में बाधा आती है। यहां के 125 छात्र भी पुराने और असुरक्षित भवन में ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
इन मामलों के उजागर होने के बाद अब प्रशासन की नींद टूटी है। डीपीसी छतरपुर, एपीएस पांडेय के अनुसार, जिन निकायों और पंचायतों ने राशि निकालने के बाद काम अधूरा छोड़ा है, उनके खिलाफ वसूली के आदेश जारी कर दिए गए हैं। विभाग का दावा है कि जैसे ही राशि वापस प्राप्त होगी, इन अधूरे भवनों को पूरा कराया जाएगा। हालांकि, सवाल यह उठता है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से जो बच्चे इन जर्जर भवनों में पढऩे को मजबूर रहे, उनकी इस शिक्षा की क्षति का जिम्मेदार कौन है?