
जिले में मई के महीने से शुरू हुआ सूर्यदेव का रौद्र रूप और भीषण लू के थपेड़े जून की शुरुआत में भी आम जनजीवन को पूरी तरह झुलसा रहे हैं। तापमान 47 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचकर हर दिन नए रिकॉर्ड बना रहा है, जिससे पूरा शहर मानो एक धधकती भट्टी में तब्दील हो चुका है। दोपहर होते ही शहर की प्रमुख सड़कें और चौराहे किसी अघोषित कर्फ्यू की तरह सूने पड़ जाते हैं। इस जानलेवा गर्मी से नागरिकों को बचाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा हीट एक्शन प्लान के तहत फाइलों और वातानुकूलित कमरों में बैठकों के दौर तो खूब चले, लेकिन जमीनी स्तर पर जनता को सीधी राहत देने वाले सबसे महत्वपूर्ण मोर्चों पर भारी नाकामी सामने आई है। प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह फासला न केवल चिंताजनक है, बल्कि आम आदमी के स्वास्थ्य और जीवन के साथ एक सीधा खिलवाड़ भी है।
हीट एक्शन प्लान के तहत प्रशासन द्वारा लू और अत्यधिक गर्मी से बचाव के लिए जो प्रयास किए गए, वे मुख्य रूप से दिशा-निर्देशों, कागजी फरमानों और जल आपूर्ति की बैठकों तक ही सिमट कर रह गए।पेयजल संकट से निपटने की कवायद: प्रशासन ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए विशेष समीक्षा बैठकें कीं। प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की सप्लाई सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए और कुछ चुनिंदा सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ खोलकर प्रशासन ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।
एडवाइजरी का दौर: मौसम विभाग और स्वास्थ्य विभाग के समन्वय से आम लोगों को जागरूक करने के लिए सोशल मीडिया और अन्य संचार माध्यमों से सुरक्षात्मक सलाह और पूर्व चेतावनी लगातार जारी की गई। लेकिन बचाव के साधन उपलब्ध नहीं कराए गए।
रूटीन प्रशासनिक दिशा-निर्देश: भीषण गर्मी को देखते हुए स्कूलों, आंगनबाड़ियों और सरकारी कार्यालयों के समय और संचालन को लेकर रूटीन गाइडलाइंस जारी कर दी गईं।लक्षित वर्गों को नसीहत: धूप में काम करने वाले मजदूरों, किसानों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए विशेष सुरक्षात्मक दिशा-निर्देश जारी कर व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया, लेकिन सड़कों पर काम करने वाले इन मजदूरों के लिए छांव का कोई प्रबंध नहीं हुआ।
डिवाइडर की हरियाली बचाई, इंसान को भुलाया: नगरपालिका द्वारा पन्ना रोड समेत अन्य प्रमुख डिवाइडरों पर लगे पौधों को पानी देने का काम तो नियमित किया गया, जिससे भीषण गर्मी में वहां की हरियाली बची रही, लेकिन उसी सड़क से गुजरने वाले तपते राहगीरों की पूरी तरह अनदेखी की गई।
जहां एक तरफ आम नागरिक 47 डिग्री के टॉर्चर में झुलस रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी, विभागों के बीच तालमेल के अभाव और अदूरदर्शिता के कारण धरातल पर योजनाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
सडक़ों से गायब रहीं मिस्टिंग मशीनें, पौधों की सिंचाई में जुटी रही गाड़ी: एक प्रभावी हीट एक्शन प्लान के तहत नगर निकायों की यह अनिवार्य जिम्मेदारी होती है कि वे छत्रसाल चौक, बस स्टैंड और व्यस्त बाजारों में मिस्टिंग मशीनों (पानी का बारीक छिड़काव करने वाली मशीनें) के जरिए तापमान को नियंत्रित करें। लेकिन नगरपालिका द्वारा 30 लाख रुपए की भारी-भरकम लागत से खरीदी गई जेट कम फॉगिंग मशीन का उपयोग आम जनता को राहत देने के लिए नहीं किया गया। इस महंगी मशीन को केवल डिवाइडर के पौधों को सींचने में लगा दिया गया, जिससे जनता तपती दोपहरी में एक-एक बूंद ठंडी फुहार के लिए तरसती रही।
खजुराहो समेत 14 निकायों में मशीनें तक नहीं: जिले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विश्व धरोहर और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन नगरी खजुराहो समेत जिले के 14 स्थानीय निकायों नौगांव, महाराजपुर, बिजाबर, सटई, गौरिहार, चंदला, राजनगर, सटई, घुवारा, बड़ामलहरा, बकस्वाहा, हरपालपुर के पास जनता और पर्यटकों को लू से राहत देने के लिए एक भी मिस्टिंग मशीन उपलब्ध नहीं है। पर्यटन नगरी पूरी तरह आग उगल रही है।
प्रशासन की ओर से दावा किया गया था कि सरकारी अस्पतालों में हीट स्ट्रोक वॉर्ड और आवश्यक दवाओं की विशेष व्यवस्था की गई है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अस्पताल के वॉर्डों में भर्ती मरीजों के लिए पर्याप्त कूलिंग (एसी/कूलर) की व्यवस्था ही नहीं थी। जो कूलर लगे भी थे, वे गर्म हवा फेंक रहे थे। अचानक बढ़ने वाले उल्टी-दस्त और डिहाइड्रेशन के मरीजों की भीड़ को संभालने के इंतजाम नाकाफी साबित हुए। हालांकि जिला अस्पताल की छत पर कूल प्रूफ कोटिंग के लिए व्हाइट पेंट पोता गया है। लेकिन सभी सरकारी भवनों में इस तरह की पेंटिंग नहीं की गई है।
विकास और सडक़ चौड़ीकरण के नाम पर शहर के सैकड़ों पुराने और छायादार पेड़ (बरगद, नीम, पीपल) बेरहमी से काट दिए गए। इसके बदले में जो पौधे रोपे गए, उन्हें सड़कों के किनारे लगाने के बजाय शहर के 11 पार्कों के अंदर लगाकर सिर्फ कागजी खानापूर्ति कर ली गई। नतीजतन, सडक़ें पूरी तरह नग्न और भट्टी जैसी हो गई हैं, जहां दो पल छांव में खड़े होने की जगह नहीं बची है।
कंक्रीट का जंगल बना शहर, गायब रूफ गार्डन: शहर में नियमों को ताक पर रखकर पूरे-पूरे प्लॉट पर बिना किसी ओपन स्पेस या ग्रीन कवर्ड एरिया के कंक्रीट के बहुमंजिला मकान खड़े किए जा रहे हैं। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के नियमों के बावजूद रूफ गार्डन (छत पर बागवानी) और वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) की व्यवस्था सिर्फ फाइलों तक सीमित है। इस कंक्रीट के रिफ्लेक्शन और हीट आइलैंड इफेक्ट के कारण शहर का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी ज्यादा महसूस हो रहा है।
ग्रीन कवर और ऑक्सीजोन का काम अधूरा: शहर के बाहर 11 हजार पौधे लगाकर ऑक्सीजोन बनाने का बड़ा ढिंढोरा पीटा गया था, लेकिन यह ऑक्सीजोन अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। प्रशासन के पास इस भीषण गर्मी में इस प्रोजेक्ट से शहर को कोई तात्कालिक लाभ देने की कोई रणनीति नहीं है।
अर्थव्यवस्था और दिहाड़ी मजदूरों पर दोहरी मारइस कुप्रबंधन और भीषण गर्मी का असर सिर्फ आम जनमानस के स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि जिले के व्यापार और पर्यटन पर भी घातक साबित हो रहा है।
पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान: खजुराहो जैसी जगह पर गर्मी से बचाव के कोई पुख्ता इंतजाम (कूलिंग जोन या ग्रीन शेड) न होने से पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। इसका सीधा असर स्थानीय व्यापार, होटल उद्योग, टैक्सी चालकों और गाइडों की आजीविका पर पड़ रहा है।
दिहाड़ी मजदूरों का जीवन संकट में: फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले छोटे व्यापारी, ठेला चालक और दिहाड़ी मजदूर इस जानलेवा गर्मी में भी दो वक्त की रोटी के लिए काम करने को मजबूर हैं। प्रशासन द्वारा प्रमुख चौराहों पर शेड, अस्थाई आराम घरों या कूलिंग शेल्टर्स की कोई व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे वे सीधे हीट स्ट्रोक के शिकार हो रहे हैं।
तालाबों और सड़कों के कंक्रीटीकरण से जमीन का जलस्तर और नमी खत्म हो रही है, जिससे गर्मी तेजी से बढ़ रही है। शहर में कुल 11 तालाब हैं और अतिक्रमण व कंक्रीट के कारण सभी की यही बुरी हालत है। पूरे शहर में लगभग 50 हजार मकान हैं, लेकिन कुछ सौ घरों को छोड़कर किसी भी घर में गार्डन या हरियाली नहीं है। जल संरक्षण के लिए वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था भी सिर्फ नए भवनों की फाइलों तक ही सीमित होकर रह गई है। प्राकृतिक जल स्रोतों और पेड़-पौधों के इस भारी खात्मे के कारण जमीन पूरी तरह सूख चुकी है और आज पूरा शहर तपती भट्टी बन चुका है।