छतरपुर

मदर्स डे विशेष: कारगिल युद्ध में पति की शहादत के बाद ममता का रण, श्याम बाई ने अकेले दम पर सींचा बच्चों का भविष्य, पति के सपनों को दी नई उड़ान, बेटी और बेटों को बनाया काबिल

1999 के कारगिल युद्ध में जब उनके पति धर्मदास पटेल भारत माता की रक्षा करते हुए शहीद हुए, तो श्याम बाई के सामने दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। लेकिन, एक वीरांगना की पत्नी ने हार मानने के बजाय अपने मातृत्व को ढाल बनाया और आज उनके बच्चे सफलता के शिखर पर हैं।

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May 10, 2026
श्याम बाई

मदर्स डे केवल उपहारों या सोशल मीडिया पोस्ट का दिन नहीं है, बल्कि यह उस निस्वार्थ प्रेम और अटूट संघर्ष को सलाम करने का दिन है, जो एक मां अपने बच्चों के लिए करती है। छतरपुर जिले के मझगुवां (महाराजपुर तहसील) की श्याम बाई की कहानी इस बात का जीवंत प्रमाण है। साल 1999 के कारगिल युद्ध में जब उनके पति धर्मदास पटेल भारत माता की रक्षा करते हुए शहीद हुए, तो श्याम बाई के सामने दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। लेकिन, एक वीरांगना की पत्नी ने हार मानने के बजाय अपने मातृत्व को ढाल बनाया और आज उनके बच्चे सफलता के शिखर पर हैं।

शहादत के बाद का कठिन सफर

कारगिल के समर में सीआरपीएफ के जवान धर्मदास पटेल ने जब अपनी आहुति दी, तब श्याम बाई के पास तीन मासूम बच्चे थे। उस समय उनकी बेटी महज 7 साल की थी, बड़ा बेटा अशोक 6 साल का और छोटा बेटा पवन सिर्फ 4 साल का था। ग्रामीण परिवेश में एक अकेली महिला के लिए बच्चों की परवरिश और उनकी शिक्षा की राह आसान नहीं थी। सामाजिक बंदिशों और आर्थिक चुनौतियों के बीच, श्याम बाई ने संकल्प लिया कि वह अपने पति के उस सपने को अधूरा नहीं रहने देंगी, जो उन्होंने अपने बच्चों के लिए देखा था।

शिक्षा को बनाया हथियार, पूरे किए पति के अरमान

शहीद धर्मदास चाहते थे कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर काबिल बनें। श्याम बाई ने दिन-रात एक कर बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया:

बेटी की शिक्षा- सबसे पहले बेटी को स्नातक तक पढ़ाया और उसकी अच्छे घर में शादी कर उसे सुखी जीवन दिया।बड़ा बेटा (अशोक कुमार)- श्याम बाई की मेहनत का ही नतीजा है कि अशोक ने बीटेक (इंजीनियरिंग) की पढ़ाई पूरी की। आज वह उन्नत खेती के माध्यम से परिवार को समृद्ध बना रहे हैं।

छोटा बेटा (पवन कुमार)- छोटे बेटे को उन्होंने फार्मेसी की डिग्री दिलाई। वर्तमान में पवन कुमार मझगुवां के सरपंच हैं और जनसेवा के कार्यों में सक्रिय हैं।

संघर्ष और समर्पण की मिसाल

श्याम बाई बताती हैं कि पिता का साया हटने के बाद उन्होंने कभी बच्चों को यह महसूस नहीं होने दिया कि वे अकेले हैं। उन्होंने खुद को केवल एक मां तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एक पिता की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। आज जब उनके दोनों बेटे समाज में सम्मानित पदों पर हैं और परिवार खुशहाल है, तो यह श्याम बाई के 26 वर्षों के कड़े तप का ही परिणाम है।

सैनिक की शहादत देश के लिए गौरव होती है, लेकिन पीछे छूटे परिवार के लिए संघर्ष की एक लंबी दास्तान। श्याम बाई जैसी माताएं हमें सिखाती हैं कि संकल्प और ममता के बल पर किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है। इस मदर्स डे पर, पत्रिका ऐसी ही साहसी माताओं को नमन करता है, जिन्होंने अभावों में भी अपने बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल बनाया।

Updated on:
10 May 2026 10:31 am
Published on:
10 May 2026 10:29 am
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