कार्गो विमान से पहुंची दुर्लभ बॉम्बे पॉजिटिव रक्त की यूनिट, ग्वालियर में मौत को मात देने की अद्भुत दास्तां छतरपुर. आधुनिक चिकित्सा और डिजिटल युग में भी कभी-कभी ऐसी स्थितियां बन जाती हैं जहां सरकारी तंत्र और अस्पताल के संसाधन बौने साबित होने लगते हैं। छतरपुर के दौरिया गांव की 26 वर्षीय प्रसूता मालती पाल […]
कार्गो विमान से पहुंची दुर्लभ बॉम्बे पॉजिटिव रक्त की यूनिट, ग्वालियर में मौत को मात देने की अद्भुत दास्तां
छतरपुर. आधुनिक चिकित्सा और डिजिटल युग में भी कभी-कभी ऐसी स्थितियां बन जाती हैं जहां सरकारी तंत्र और अस्पताल के संसाधन बौने साबित होने लगते हैं। छतरपुर के दौरिया गांव की 26 वर्षीय प्रसूता मालती पाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब जिला अस्पताल की एक मशीनरी चूक ने मालती को मौत के दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया, तब देशभर के रक्तवीरों के एक निस्वार्थ नेटवर्क ने सराहनीय काम किया है।
प्रसव के बाद शुरू हुआ मौत से संघर्ष
मालती पाल ने छतरपुर जिला अस्पताल में एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया था, लेकिन खुशियां ज्यादा देर नहीं टिकीं। प्रसव के बाद मालती की ब्लीडिंग नहीं रुक रही थी। अस्पताल में प्राथमिक जांच के बाद डॉक्टरों ने उसका ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव बताया। एक मार्च को उसके पति दीपक पाल ने रक्तदान किया और वही खून मालती को चढ़ा दिया गया। लेकिन शरीर ने उस खून को स्वीकार करने के बजाय प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। मालती की हालत बिगड़ने लगी, गुर्दे (किडनी) प्रभावित हुए और वह डायलिसिस की स्थिति में पहुंच गई।
ग्वालियर में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
जब मालती को गंभीर हालत में ग्वालियर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, तब वहां के विशेषज्ञों ने उन्नत लैब में जांच की। रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया मालती का ब्लड ग्रुप सामान्य ओ पॉजिटिव नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे दुर्लभ बॉम्बे पॉजिटिव था। यह ब्लड ग्रुप इतना दुर्लभ है कि 10 लाख लोगों में से केवल 4 लोगों में पाया जाता है। चूंकि इसमें एच एंटीजन नहीं होता, इसलिए साधारण जांच में यह हमेशा ओ पॉजिटिव ही दिखाई देता है। जिला अस्पताल में एडवांस मशीनें न होने के कारण यह बड़ी चूक हुई, जिसने मालती की रगों में दौड़ते खून को ही उसके लिए जहर बना दिया था।
1500 किमी का सफर और कार्गो विमान की रफ्तार
ग्वालियर में डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि यदि तुरंत बॉम्बे पॉजिटिव ब्लड नहीं मिला, तो मालती को बचाना नामुमकिन होगा। इसी संकट के समय छतरपुर के रक्तवीरसेवादल के अमित जैन ने मोर्चा संभाला। इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए देशभर में संपर्क किया गया। खबर आई कि यह दुर्लभ ब्लड विशाखापट्टनम में उपलब्ध है। समय रेत की तरह हाथ से फिसल रहा था। विशाखापट्टनम से ग्वालियर की दूरी लगभग 1500 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से समय नहीं था, इसलिए रक्त की यूनिट को कार्गो विमान के जरिए भेजने की व्यवस्था की गई। देशभर के अलग-अलग शहरों के लोग इस मिशन से जुड़ते गए।
इन फरिश्तों ने जोड़ा सांसों का सिरा
इस पूरे ऑपरेशन में इंसानियत की एक अटूट चेन बनी। मुंबई से विनय शेट्टी, सांगली से विक्रम यादव, सेंधवा से अशोक राठौड़, ब्यावरा से आशीष सिंह और सुल्तानपुर से अनुज श्रीवास्तव जैसे लोगों ने समन्वय किया। विशाखापट्टनम से खून कार्गो विमान में उड़ा और गुरुवार सुबह ग्वालियर पहुंचा। वहां से डॉक्टरों ने तुरंत मालती को रक्त चढ़ाया, जिसके बाद उसकी हालत में धीरे-धीरे सुधार होना शुरू हुआ।
बड़ासवाल: कब सुधरेगा जिला अस्पताल का सिस्टम?
यह घटना जितनी प्रेरणादायक है, उतनी ही डरावनी भी। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जिला अस्पतालों में एंटी-एच लेक्टिन और एडवांस ब्लड ग्रुपिंग मशीनें होतीं, तो मालती को इस जानलेवा जोखिम से नहीं गुजरना पड़ता। मालती तो इंसानियत के भरोसे बच गई, लेकिन सिस्टम की यह कमी भविष्य में किसी और के लिए भारी पड़सकती है।