
छिंदवाड़ा। लोकसभा चुनाव में पहले वोट डालने के प्रति जागरूकता का अभाव था। शुरुआत के चार चुनाव में तो 40 फीसदी से कम वोटर मतदान केंद्र पहुंच पाए। वर्ष 1990 के दशक के बाद जागरूकता बढ़ी। इसका परिणाम रहा कि वर्ष 2019 में सबसे ज्यादा 82.52 फीसदी वोट पड़ा।
संसदीय क्षेत्र के इतिहास में नजर डाली जाए तो आजादी के बाद वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव में जनमानस लोकतंत्र में भागीदारी के लिए तैयार नहीं था। लोग राजतंत्र के अधीन होने से नई व्यवस्था जानते नहीं थे। अशिक्षा, गरीबी ज्यादा थी। इस साल 3.81 लाख वोटर्स में से 1.31 लाख मतदाता बूथ पर पहुंचे। मतदान प्रतिशत 34.51 प्रतिशत रहा। उस समय लोकसभा क्षेत्र मेंं सिवनी, बैतूल जिला भी सम्मिलित था। वर्ष 1957 में जब दो सांसद नारायण राव वाडीवा और भीकूलाल लक्ष्मीचंद चुने गए, तब वोट प्रतिशत 66.51 रहा। फिर 1962 के चुनाव में यह प्रतिशत फिर घटकर 36.55 हो गया। 1967 में 39.13 और 1971 में 38.15 प्रतिशत रहा।
वर्ष 1977 में भी जब इमरजेंसी के बाद जन आक्रोश भी था, तब भी छिंदवाड़ा का मतदान प्रतिशत 44.12 रहा। वर्ष 1980 में यह 50 प्रतिशत के पार पहुंचा। वर्ष 1996 के आम चुनाव में मतदान प्रतिशत 60 फीसदी के पार हुआ। 2009 में 70 प्रतिशत रहा। सबसे ज्यादा 2019 के लोकसभा चुनाव में 82 फीसदी से अधिक वोट डाले गए।
मतदान के प्रति चला अभियान
पहले सरकारें मतदान के प्रति जागरूकता अभियान पर ध्यान नहीं देती थी। इससे मतदाता भी हतोत्साहित थे। पिछले कुछ चुनाव से मतदाताओं को घर से बाहर निकालने नुक्कड़ नाटक, जागरूकता रैली तथा कार्यक्रम हो रहे हैं। इससे मतदान प्रतिशत 80 फीसदी से ऊपर हुआ है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को चुनने महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है।
पहले पांच किमी दूर थे मतदान केन्द्र
पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि पहले सीमित संसाधन में चुनाव होने से मतदान केन्द्रों की दूरी पांच किमी तक होती थी। सडक़ भी जर्जर-बदहाल थी। मतदान करने सुबह से शाम तक का समय लग जाता था। समय के बदलाव के साथ मतदान केंद्रों की संख्या भी बढ़ी। रोड जैसे साधन भी बेहतर हो गए। इसका असर मतदान प्रतिशत पर भी देखने को मिला।