प्रदेश, देश व विदेश से शोध करने पहुंच रहे शोधकर्ता, कोलोरेडो यूनिवर्सिटी अमेरिका ने की है पुराने जीवाश्म होने की पुष्टि, प्रोफेसर दशरथ कापगते ने एकत्रित किए हैं ऐसे 200 जीवाश्म
छिंदवाड़ा. जिले की चौरई तहसील का मोहगांव कला गांव वनस्पति जीवाश्म का लंबे समय से केंद्र बना हुआ है, पीएचडी के शोध विषय मध्य भारत के जीवाश्म के शोध के दौरान यहां से 4.5 से 6 करोड़ साल पुराना वनस्पति जीवाश्म मोहगांव कला से मिला है। इस स्थान पर प्रदेश, देश व विदेश से शोध करने के लिए शोधकर्ता लगातार छिंदवाड़ा के मोहगांव के साथ ही मंडला, सिवनी व बैतूल जिले में भी पहुंचे है। मोहगांव में मिले जीवाश्म के करोड़ों साल पुराने होने की पुष्टी कार्बन डेटिंग पद्धति से भी टेस्ट हो चुकी है, कोलोरेडो यूनिवर्सिटी अमेरिका में जांच के बाद वनस्पति जीवाश्म के पुराने होने की पुष्टी की गई है। महाराष्ट्र के भंडारा जिले के रहने वाले प्रो दशरथ कापगते ने वर्ष 1980 से लगातार चौरई के मोहगांव कला में शोध कार्य किया है। उनके द्वारा कई वर्षों में अब तक 200 से ज्यादा जीवाश्म का संकलन किया है।
डॉ दशरथ कापगते जो कि जेएम पटेल कॉलेज भंडारा में वनस्पति विभाग में प्रोफेसर लगभग 30 वर्ष रहने के बाद वर्तमान में 2016 से फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी अमेरिका में मानद प्राध्यापक है। उनके मार्गदर्शन में 14 छात्रों ने मध्य भारत के जीवाश्म विषय पर पीएचडी की है जिसमें नौ छात्र मप्र के है, जो शोध कार्य करने के चौरई के मोहगांव कला पहुंचते थे। इसके साथ ही अमेरिका की चार यूनिवर्सिटी के 14 शोधकर्ता अध्ययन के लिए लगातार मोहगांव चौरई आते रहते है।
शोध के दौरान छिंदवाड़ा के चौरई मोहगांव कला के साथ ही आसपास के जिले मंडला, बैतूल व सिवनी से एकत्रित किए गए 188 जीवाश्म के नमूने तथा 400 से ज्यादा स्लाइड को फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के संग्रहालय में रखा गया है। प्रो दशरथ कापगते ने बताया कि जिस पर वहां के विद्यार्थी शोध के दौरान अध्ययन करते है।
प्रो दशरथ कापगते ने अपने शोध तथा अपने शोधकर्ता विद्यार्थियों को हमेशा जीवाश्म की तलाश में चौरई के मोहगांव कला लेकर पहुंचे है। वह बताते है कि कई छात्रों ने उनके सानिध्य में मध्य भारत के जीवाश्म विषय पर शोध किया जिसमें मप्र व महाराष्ट्र के विद्यार्थी शामिल है। लेकिन मप्र में पुरा वनस्पति विज्ञान विषय की पढ़ाई ही नहीं होती है जबकि मप्र में जीवाश्म का खजाना है। किसी भी यूनिवर्सिटी में यह विषय पढ़ाया ही नहीं जाता है।
प्रो दशरथ कापगते बताते है कि प्रोफेसर बीरबल साहनी, जिन्हें भारतीय पुरा-वनस्पति विज्ञान का जनक माना जाता है। प्रो. साहनी ने छिंदवाड़ा और उसके आसपास के क्षेत्रों में पाई जाने वाली डेक्कन इंटरट्रैपियन चट्टानों से पौधों के जीवाश्म का व्यापक अध्ययन किया था। प्रो. साहनी द्वारा एकत्रित किए गए वनस्पति जीवाश्म, जो छिंदवाड़ा और मध्य प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से प्राप्त हुए थे, आज भी बीरबल साहनी पुरा विज्ञान संस्थान लखनऊ में रखे हुए है।