छिंदवाड़ा

वो भी क्या दिन थे..जब होली में घरों से लकडिय़ां मांगते और बनते थे पकवान

त्यौहार के तीन दिन पहले से हमारी मां, चाची और दादी मीठे पकवान बनाया करती थी। होली के दिन छोटे-बड़े सभी उत्सव के रंग में सराबोर रहते थे। बस स्टैण्ड में शुक्रवार को एकत्रित हुए बुजुर्गो ने अपने चालीस साल पुरानी होली के अनुभव सुनाए।

2 min read

वो भी क्या दिन थे…जब बचपन में लडक़ों की उम्र में हमारी टोली १५ दिन पहले से होली की लकडिय़ों को एकत्र करने में लग जाती थी। जंगल से टेसू के फूल तोडक़र लाते और उसे पीसकर रंग बनाते। फिर त्यौहार के तीन दिन पहले से हमारी मां, चाची और दादी मीठे पकवान बनाया करती थी। होली के दिन छोटे-बड़े सभी उत्सव के रंग में सराबोर रहते थे। बस स्टैण्ड में शुक्रवार को एकत्रित हुए बुजुर्गो ने अपने चालीस साल पुरानी होली के अनुभव सुनाए।


७० साल के अघ्घन शाह उइके बताने लगे कि बचपन में हमारे दिन कुछ और थे। आज होली में काफी बदलाव आ गया है। पहले होली का उत्सव का इंतजार किया जाता था। अब कब यह दिन चला जाता है, पता नहीं चलता। घरों मेंं मिलने जुलने वाले मेहमानों का तांता लगा रहता था, जिन्हें नाश्ते मीठा, नमकीन देने की परंपरा थी।


सेवानिवृत्त सैलटैक्स कर्मचारी बालाराम परतेती का कहना पड़ा कि हम आदिवासी लोगों की होली मनाने की परम्परा अलग थी। पहले होली जलने के बाद अंगार को उठाकर घर लाते थे। फिर उसे साल भर सुरक्षित रखते थेे। घर की मां-बहनें इस कार्य में निपुण थी। अब ये परंपरा शहरीकरण के साथ मिटती जा रही है। सेवानिवृत्त एसडीओ विजय सिंह कुशरे बताते हैं कि हमारा बचपना सोशल मीडिया के युग से अलग था। रंगों के त्यौहार का उत्साह अलग था। अब लगता है कि पुरानी जीवन शैली में काफी कुछ था, अब होली की परंपराएं दिखाई नहीं देती है।

बीडी भारती बताते हैं कि गांव में आदिवासी परंपरा में मेघनाथ खड़ेला बाबा को पूजने की परंपरा थी। जिसे आज भी कुछ लोग निभा रहे हैं। शहर में यह परम्परा लुप्त होती जा रही है। शिव कुमार सिरसाम का कहना है कि होली में प्रेम, सद्भाव का वातावरण होता था, अब ये संस्कृति मिट गई है। अब पड़ोस वाला व्यक्ति से ही बातचीत नहीं होती।


रमेश बेले बताते हैं कि बचपन में होली के दिन फाग गीत पूरी रात महिलाएं गाया करती थी, ढोलक पर सब लोग नाच लिया करते थे। बचपन में दोस्तों के साथ होली मनाया करते थे। अब ये परंपरा भी नहीं रही। विक्की डेहरिया का कहना पड़ा कि घर से लेकर स्कूल तक होली खेलने लगते थे। अब सोशल मीडिया युग में लोग अकेलेपन के शिकार है। परंपराएं मिटती जा रही है।

Updated on:
28 Feb 2026 11:46 am
Published on:
28 Feb 2026 11:45 am
Also Read
View All

अगली खबर