
चित्रकूट. कानून की नजर में भले ही कोई गुनाहों का देवता हो, परंतु समाज की आँखों में जरुरी नहीं कि उस इंसान के लिए वैसी ही छवि हो। भारतीय लोकतंत्र में कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने बीहड़ की बेरहम दुनिया से निकलते हुए लोकतंत्र के मंदिर में दस्तक दी और जनता की नजरों में खुद को रॉबिनहुड की तरह पेश किया। चंबल से लेकर बुंदेलखण्ड के बीहड़ों के कई बेताज बादशाहों ने राजनीति के गलियारे में दखलन्दाजी की और खुद हथियारों को सरकार की शरण में समर्पित कर राजनीति के अखाड़े में उतर गए। और बन गए जनता के लोकप्रिय प्रतिनिधि।
चित्रकूट का ऐसा ही एक नाम है विधायक प्रेम सिंह। कभी बीहड़ की दुनिया में गरजती हुई बंदूकों के साथ विचरण करने वाले प्रेम सिंह राजनीति में लोकप्रियता का झंडा गाड़ते हुए तीन बार विधायक चुने गए। लेकिन अचानक काल ने दरवाजे पर दस्तक दी और विधायक प्रेम सिंह का निधन हो गया।
विधायक के निधन से अब चित्रकूट विधानसभा सीट पर होने जा रहा है उपचुनाव-
इस उपचुनाव में जीत का परचम लहराने के लिए बीजेपी व् कांग्रेस में कांटे की टक्कर निश्चित है। अलबत्ता प्रेम सिंह कट्टर कॉंग्रेसी थे और क्षेत्र से तीन बार विधायक भी रह चुके थे, तो कांग्रेस बहुत टेंशन में नहीं है। वहीं बीजेपी चुनाव जीतने के लिए पूरी जी जान लगा रही है। विधायक प्रेम सिंह ने बीहड़ से निकलकर विधानसभा तक का सफर किया और जनता की नजरों में उनके खेवनहार बने।
चित्रकूट विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। दरअसल मध्य प्रदेश के सतना जनपद के तहत आने वाली चित्रकूट विधानसभा सीट पर 9 नवम्बर को उपचुनाव में मतदान होना है। इस सीट पर तीन बार से कांग्रेस विधायक रहे प्रेम सिंह का इसी वर्ष 29 मई को निधन हो गया था जिससे यह सीट रिक्त हो गई। चित्रकूट उत्तर प्रदेश व् मध्य प्रदेश के बीच बसा हुआ है जिसके तहत चित्रकूट की एक विधानसभा यूपी के तहत तो दूसरी विधानसभा एमपी के अंतर्गत आती है। एमपी की इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा है। यहां से प्रेम सिंह तीन बार विधायक रहे। कभी बीहड़ में खौफ का साम्राज्य कायम करने वाले प्रेम सिंह ने हथियार छोड़कर राजनीति में प्रयास किया तो तीन बार विधानसभा पहुंचे और जनता के बीच लोकप्रिय रहे।
दबंगों का विरोध व् पुश्तैनी जमीन हासिल करने को अपनाया बागी जीवन-
विधायक प्रेम सिंह का जन्म चित्रकूट यूपी के कोलौहां गांव में 8 सितंबर 1951 को हुआ था। कुछ समय बाद उनका परिवार पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के सतना जनपद अंतर्गत बरौंधा गांव में जाकर बस गया। वे कक्षा 5 तक की ही पढ़ाई पूरी कर पाए थे। गांव में पुश्तैनी जमीन पर दबंगों की नजर थी जिसे बाद में हड़प लिया गया। कई जगह गुहार लगाने के बाद जब सुनवाई नहीं हुई तो 1970 के दशक में प्रेम सिंह ने हाथों में बंदूक थाम बीहड़ का रास्ता चुन लिया और दस्यु जीवन में दाखिल हो गए। अपना खुद का गिरोह बनाकर जंगल में चहलकदमी शुरू कर दी। दबंगों से अपनी जमीन वापस छुड़ाई।
राजनीतिक सफ़र
लगभग दस वर्षों तक बीहड़ में बागी जीवन जीने वाले प्रेम सिंह को जानने वाले बताते हैं कि वे कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह के कट्टर समर्थक थे। सन् 1980 के करीब अर्जुन सिंह ने उन्हें बीहड़ से निकालकर आत्म समर्पण करवाया और प्रेम सिंह ने दस्यु जीवन से सन्यास लेकर राजनीति में कांग्रेस की छाया में प्रवेश किया। 1981 से 85 तक प्रेम सिंह सतना जिला बीस सूत्रीय समिति के प्रमुख रहे। 1985 में जिला तेंदूपत्ता समिति के सदस्य रहे। पहली बार 1998 में प्रेम सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चित्रकूट विधानसभा से किस्मत आजमाई और विधायक चुन लिए गए। दूसरी बार सन् 2003 में फिर चुनाव जीत गए। सन् 2013 में प्रेम सिंह तीसरी बार इसी सीट से विधायक चुने गए। इस वर्ष मई में उनका निधन होने से यह सीट रिक्त हो गई और अब इस पर उपचुनाव हो रहा है।
समाजसेवा में गुजारा पूरा जीवन
प्रेम सिंह अविवाहित थे। समाजसेवा के प्रति उनका गहरा लगाव था जिसकी परिणीति थी उनका तीन बार विधायक चुना जाना। प्रेम सिंह के भतीजे मंगल सिंह बताते हैं कि वे जनता के बीच हमेशा बने रहते थे। गरीब कन्याओं की शादी गरीबों की मदद के कारण क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान थी। प्रेम सिंह ने कभी कोई आंदोलन या प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन कांग्रेस में सबसे ज्यादा भीड़ लाने वाले नेताओं के रूप में उनकी पहचान थी।
कांग्रेस को साख बचाने की चुनौती, बीजेपी के लिए राह कठिन-
इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा है और उपचुनाव में उसके सामने साख बचाने की चुनौती है तो बीजेपी की राह कठिन है। बीजेपी ने पसीना बहाना शुरू कर दिया है इस उपचुनाव को लेकर तो वहीं कांग्रेस भी अपने दिग्गजों को बुलावा भेज चुकी है। दो चार दिन में प्रचार की रफ़्तार तेज होने वाली है जिससे काफी हद तक रुझान स्पष्ट हो जाएगा।