यहां मौजूद पुरानी मुद्रित पुस्तकें अब बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। यह पुस्तकालय केवल रतनगढ़ (Ratangarh) की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की धरोहर है, जिसमें भारत का बौद्धिक इतिहास समाहित है।
रतनगढ़. केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन संचालित 'ज्ञानभारतम् मिशन' के अंतर्गत, जयपुर स्थित क्लस्टर सेंटर विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान (श्याम नगर) के विशेषज्ञों के एक दल ने रतनगढ़ के ऐतिहासिक हनुमान पुस्तकालय (Historical Hanuman Library) का दो दिवसीय गहन सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण में भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहरें उनके सामने आईं।
एक सदी पुरानी विरासत : हनुमान पुस्तकालय
सर्वेक्षण के दौरान यह बात प्रमुखता से उभरी कि सन् 1919 में स्थापित हनुमान पुस्तकालय केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का एक जीता-जागता दस्तावेज है। यहां हस्तलिखित पांडुलिपियों और पुरानी मुद्रित पुस्तकों का एक असीम और दुर्लभ भंडार सुरक्षित है। पुस्तकालय की ऐतिहासिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए वैद्य बालकृष्ण गोस्वामी ने विस्तार से जानकारी दी। वैद्य गोस्वामी ने बताया कि "हनुमान पुस्तकालय 1919 से ही ज्ञान के एक प्रकाश स्तंभ के रूप में खड़ा है। हमारे पूर्वजों ने बड़े जतन से यहां वेद, आयुर्वेद, ज्योतिष और साहित्य से जुड़ी हजारों दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का संकलन किया था।
यहां मौजूद पुरानी मुद्रित पुस्तकें अब बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। यह पुस्तकालय केवल रतनगढ़ (Ratangarh) की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की धरोहर है, जिसमें भारत का बौद्धिक इतिहास समाहित है।"इस सर्वेक्षण अभियान में उपस्थित गणमान्य अतिथियों और विशेषज्ञों ने इन दस्तावेजों को देखकर आश्चर्य और प्रसन्नता व्यक्त की। सभी ने इस धरोहर को संरक्षित करने और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अपने विचार रखे।
संस्कृत भाषा जीवन जीने की कला
डॉ. सुरेन्द्र शर्मा (पांडुलिपि समन्वयक) ने बताया कि "ज्ञानभारतम् मिशन के तहत हमारा उद्देश्य देश के कोने-कोने में छिपी ज्ञान संपदा को खोज निकालना है। हनुमान पुस्तकालय में हमें जो पांडुलिपियां मिली हैं, वे शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन ग्रंथों का सूचीकरण और डिजिटलीकरण करना हमारी प्राथमिकता होगी ताकि भविष्य के शोधकर्ता इनका लाभ उठा सकें। अखिल भारतीय महासंगठन मंत्री, संस्कृत भारती सत्यनारायण भट्ट ने कहा संस्कृत भाषा केवल देववाणी ही नहीं, बल्कि विज्ञान और जीवन जीने की कला है।
100 वर्ष पुरानी होने के जीर्ण-शीर्ण अवस्था में
उन्होंने कहा कि यहां की पांडुलिपियों में निहित ज्ञान यह सिद्ध करता है कि हमारा अतीत कितना समृद्ध था। संस्कृत भारती और ज्ञानभारतम् मिशन का यह संयुक्त प्रयास इन लुप्तप्राय ग्रंथों को पुनर्जीवित करेगा और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगा।" पांडुलिपि संरक्षण विशेषज्ञ अवधेश वशिष्ठ ने संज्ञान में लाते हुए कहा कि "100 वर्ष से अधिक पुरानी होने के कारण कई पांडुलिपियां और पुस्तकें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। इनके कागज और स्याही को विशेष रासायनिक उपचार और संरक्षण की आवश्यकता है। हम आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर इन दस्तावेजों की आयु बढ़ाएंगे ताकि सैंकड़ों वर्षों तक यह ज्ञान सुरक्षित रह सके।"
विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान की ओर से किया गया यह सर्वेक्षण अभियान स्थानीय इतिहास और राष्ट्रीय धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। इस पहल से उम्मीद जगी है कि रतनगढ़ का यह ऐतिहासिक खजाना जल्द ही डिजिटल स्वरूप में दुनिया के सामने आएगा। इस अवसर पर सूरजमल जालान ट्रस्ट के सचिव ओमप्रकाश तापड़िया व पुस्तकाध्यक्ष अमरचंद दायमा भी उपस्थित थे।