भंवर सिंह राजपूत सादुलपुर. मरुभूमि में तहसील मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर फैली लीलकी बीड आज भी अभयारण्य बनने का इंतजार कर रही है। यह क्षेत्र लगभग 1086 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जहां बहुमूल्य जड़ी-बूटियां और अनेक दुर्लभ वन्य जीव विचरण करते हैं। यहां के प्राकृतिक संसाधन और वन्य जीवन केवल पर्यावरण की धरोहर […]
भंवर सिंह राजपूत
सादुलपुर. मरुभूमि में तहसील मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर फैली लीलकी बीड आज भी अभयारण्य बनने का इंतजार कर रही है। यह क्षेत्र लगभग 1086 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जहां बहुमूल्य जड़ी-बूटियां और अनेक दुर्लभ वन्य जीव विचरण करते हैं। यहां के प्राकृतिक संसाधन और वन्य जीवन केवल पर्यावरण की धरोहर नहीं, बल्कि ग्रामीणों की सांस्कृतिक और जीवन निर्वाह की आधारशिला भी हैं।
लेकिन, इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ लोग चोरी-छिपे पेड़ काट रहे हैं, जिससे न केवल जैव विविधता खतरे में है, बल्कि पशु-पक्षियों की जिंदगी भी असुरक्षित महसूस कर रही है। ग्रामीण कहते हैं कि वे अपनी आंखों के सामने जंगल और जीव-जंतु खोते देख रहे हैं, और बार-बार प्रशासन से आग्रह करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। वन विभाग का कहना है कि सुरक्षा पूरी की जा रही है और पेड़ों की कटाई नहीं हो रही। साथ ही वन्य जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए 18 तालाब और 14 किलोमीटर तक सुरक्षित दीवार बनाई गई है।
सिर्फ जमीन नहीं, जीव-जंतु का घर
लीलकी बीड (Leelki Beed) सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यहां प्रकृति और जीवन की विविधता बसी हुई है। वन विभाग के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 2000 चिंकारा (Chinkara), दर्जनों लोमड़ियां, सियार (Jackal), एक दर्जन से अधिक काले हिरण, लाखों सांडे, हजारों नीलगाय और बाज विचरण करते हैं। हर जीव इस बीड की प्राकृतिक धरोहर और पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा है। वन अधिकारी शंकर लाल स्वामी ने बताया कि यहां पौधों के संरक्षण के लिए नर्सरी और पशु-पक्षियों के लिए तालाब भी बनाए गए हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। जंगल में रहने वाले हर जीव की सुरक्षा अब सिर्फ सरकारी कार्रवाई पर निर्भर है।
15 किलोमीटर तक का अद्भुत नज़ारा, विकास योजना गायब
लीलकी बीड में स्थित हाथी टीला केवल ऊंचा पर्वत नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थल है जहां खड़े होकर 15 किलोमीटर दूर तक के गांवों का दृश्य देखा जा सकता है। यह नज़ारा न केवल पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि स्थानीय पर्यटन और रोजगार के लिए भी सुपर अवसर प्रदान करता है। ग्रामीणों का कहना है कि लीलकी बीड के विस्तार और विकास के लिए अनेक बार विभाग और मुख्यमंत्री को शिकायतें की जा चुकी हैं। उन्होंने अभयारण्य और कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करने की भी मांग की, ताकि यह क्षेत्र वन्य जीवन, जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक संसाधनों का सुरक्षित गढ़ बन सके। लेकिन अब तक सरकारी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे ग्रामीण और वन्य जीवन दोनों असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
रोजगार और आय के अवसर बढ़ेंगे
यदि सरकार लीलकी बीड को अभयारण्य घोषित करती है, तो क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वन विभाग की आमदनी भी सुनिश्चित होगी। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पढ़े-लिखे बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, रोजगार के साधन बढ़ेंगे और समुदाय की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। लेकिन अब तक कई बार धरना प्रदर्शन और शिकायतों के बावजूद सरकारी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे ग्रामीणों में निराशा है। ग्रामीणों की उम्मीद है कि सरकार अभ्यारण्य घोषित कर वन्य जीवन और रोजगार दोनों सुरक्षित करे।
1994: अतिक्रमण से मुक्त हुई बीड
सन 1994 से पहले, लगभग 800 हेक्टेयर क्षेत्र में अतिक्रमण और खेती शुरू हो गई थी। ग्रामीणों की शिकायतों और वन विभाग की कानूनी कार्रवाई के बाद, अदालत के माध्यम से लीलकी बीड को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। यह इतिहास दर्शाता है कि सुरक्षा और संरक्षण में गंभीरता जरूरी है, और अगर समय पर ठोस कदम न उठाए गए तो वन्य जीवन और समुदाय दोनों प्रभावित होते हैं।
इनका कहना है....
लीलकी बीड को कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करवाने के लिए उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जाएगा और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। शंकर लाल स्वामी, क्षेत्रीय वन अधिकारी, सादलपुर