कैर का उपयोग सब्जी और अचार में, बेर को ताजा व सूखे मेवे के रूप में तथा खैर से गोंद, कत्था और मजबूत लकड़ी प्राप्त होती है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है।
साहवा. मरुस्थलीय जिले की संपदा में कैर (Kair), बेर (Ber) और खैर (Khair) जैसे देशी पेड़-झाड़ियां वर्षों से ग्रामीण जीवन, भोजन और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ये प्रजातियां बीड़, ओरण, गोचर भूमि और खेतों की मेड़ों पर बिना विशेष देखरेख के प्राकृतिक रूप से पनपती हैं और ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन भी बनती रही हैं। फिर इस ओर रही उदासीनता के कारण अब ये बोझे धोरों की धरती से ओझल हो रहे हैं।
हर कोई इसके प्रति चिंता भी व्यक्त करता है, शासन प्रशासन भी इसके संरक्षण की बात करता है फिर भी कैर, बेर और खैर जैसे देशी पौधे औंधे मुंह गिर रहे है, जिसमें दोष किसका है इस पर एक दूसरे के प्रति छींटाकशी करने के अलावा धरातल पर कुछ होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। इसलिए आवश्यकता सामूहिक प्रयास करने की है।
उपयोगी कैर बेर और खैर
कैर का उपयोग सब्जी और अचार में, बेर को ताजा व सूखे मेवे के रूप में तथा खैर से गोंद, कत्था और मजबूत लकड़ी प्राप्त होती है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। बरसाती पानी के सहारे उगने वाले इन पेड़-झाड़ियों से बच्चे, महिलाएं और मजदूर फल, गोंद और लकड़ी इकट्ठा कर अतिरिक्त आय अर्जित करते हैं। वहीं धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेर का विशेष महत्व माना जाता है।
विकास या फिर अतिक्रमण
मरुस्थलीय धरती पर पनपने वाले कैर, बेर और खैर जैसे देशी पेड़-झाड़ियां कभी गांवों की पहचान हुआ करती थी लेकिन बढ़ते अतिक्रमण, सड़क निर्माण, घटते बीड़-जंगल और आधुनिकीकरण के कारण इन प्रजातियों पर संकट गहराता जा रहा है। बीड़, ओरण, गोचर भूमि के सिकुड़ने और जंगलों के कटाव ने इनके अस्तित्व पर खतरा खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वन और कृषि विभाग इनके संरक्षण और संवर्धन की योजनाएं बनाकर बागवानी में शामिल करें, तो न केवल प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रहेगी बल्कि ग्रामीणों को स्थायी रोजगार के अवसर भी मिल सकते हैं।
संरक्षण आवश्यक
बदलते समय में प्राकृतिक भूमि कम होने और अनियंत्रित कटाई के कारण इन पेड़-पौधों की संख्या तेजी से घट रही है। यदि समय रहते संरक्षण और संवर्धन की ठोस योजना नहीं बनाई गई, तो भविष्य में कैर, बेर और खैर केवल यादों तक सीमित रह जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि वन व कृषि विभाग यदि इन प्रजातियों को संरक्षण देकर बागवानी में शामिल करें और स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाएं, तो यह प्राकृतिक विरासत बचाने के साथ-साथ ग्रामीणों के लिए स्थायी रोजगार का माध्यम भी बन सकती है।