आधुनिकता की दौड़ में परंपरागत पेयजल स्रोतों की उपेक्षा हुई और सेठ-साहूकारों द्वारा आमजन के लिए बनवाए गए अनेक कुंड देखरेख के अभाव में जर्जर हो गए या समाप्त हो गए। घरों तक नलों से पानी पहुंचने के बाद गांव और शहरों में बने कुंड धीरे-धीरे गायब हो गए।
सादुलपुर. पुराने समय में पेयजल का एकमात्र और सबसे भरोसेमंद स्रोत माने जाने वाले वर्षा जलसंग्रहण कुंड आज एक बार फिर समय की बड़ी जरूरत बनते जा रहे हैं। जल संरक्षण को लेकर किए जा रहे प्रयासों के बीच ग्रामीणों की रुचि अब फिर से कुंड बनाकर पानी संग्रहित करने की ओर बढ़ रही है। यही कारण है कि अब लोग नए मकानों के निर्माण के समय घरों में कुंड बनाने को प्राथमिकता देने लगे हैं।
एक समय ऐसा था जब हर गांव में चार से पांच सार्वजनिक कुंड अवश्य होते थे और बरसात में एक बार भर जाने के बाद उनका पानी पूरे वर्ष पेयजल के रूप में उपयोग किया जाता था।
उपेक्षित हुए पुराने कुंड
आधुनिकता की दौड़ में परंपरागत पेयजल स्रोतों (Traditional Drinking Water Sources) की उपेक्षा हुई और सेठ-साहूकारों द्वारा आमजन के लिए बनवाए गए अनेक कुंड देखरेख के अभाव में जर्जर हो गए या समाप्त हो गए। घरों तक नलों से पानी पहुंचने के बाद गांव और शहरों में बने कुंड धीरे-धीरे गायब हो गए। कई स्थानों पर कुंडों की जमीन पर कब्जा कर रिहायशी मकान बना दिए गए। लेकिन अब भूमिगत जल (Underground Water) के खारे होने, जलस्तर (Water Level) लगातार नीचे जाने और बढ़ती आबादी के कारण पानी की किल्लत बढ़ी है, जिससे लोगों को फिर से कुंडों का महत्व याद आने लगा है।
शुद्ध जल स्वास्थ्यवर्धक
पुराने समय में जब गांवों में बिजली तक उपलब्ध नहीं थी, तब भी कुंड ही जीवन का आधार थे। कुंड का पानी शुद्ध, ठंडा और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था। लोगों का कहना था कि उस समय पानी जनित बीमारियां बहुत कम होती थीं। सार्वजनिक कुंडों पर महिलाएं लोकगीत गाते हुए पानी भरने जाती थीं, जो भारतीय संस्कृति और भाईचारे का प्रतीक था।
कुंड निर्माण का विज्ञान
प्राचीन समय में चुने और पणा से मजबूत कुंड बनाए जाते थे। इन्हें गहरा और चौड़ा बनाया जाता था ताकि अधिक मात्रा में वर्षा जल संग्रहित हो सके। कुंड के निचले हिस्से में छोटे-छोटे सुराख बनाए जाते थे, जिनसे बूंद-बूंद बारिश का पानी छनकर भीतर जमा होता था। ऊपर ढोला बनाकर कुंड को ढका जाता था ताकि सूर्य की किरणें पानी पर न पड़ें और पानी लंबे समय तक सुरक्षित रहे।आज पानी संकट के चलते लोगों की सोच बदल रही है। समाजसेवी भामाशाह श्रीवर्धनमोहतां ने शहर के वार्ड नंबर 36 रामबास, धाणक मोहल्ला और लोको कॉलोनी में पुराने पेयजल कुंडों का जीर्णोद्धार करवाकर उन्हें आमजन को समर्पित किया है। लोग भी पुराने कुंडों की सफाई कर उन्हें पुनः उपयोग में लाने लगे हैं।
शिक्षक रामसिंह कांधल, गौरीशंकर वशिष्ठ, भंवरसिंह गहलोत, शिक्षक कुशालसिंह कांधल, रामस्वरूप नाई, सोहनलाल गोदारा तथा शिवकुमार अत्रि ने बताया कि कुंड का पानी रोगरहित होता है और उसकी तासीर फ्रिज के पानी से कहीं बेहतर होती है। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण को आवश्यक बताते हुए अधिक से अधिक कुंड निर्माण पर जोर दिया।
इनका कहना है
- सरकार को जल संरक्षण के अन्य उपायों के साथ लोगों को कुंड निर्माण के लिए प्रेरित करना चाहिए। क्योंकि अब इन परंपरागत जल स्रोतों की आवश्यकता रहेगी। प्रोफेसर दलीपसिंह पूनियां
चाहे निजी मकान हो या फिर सार्वजनिक भवन बनाएं, उसकेलिए कुंड बनाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे जल संरक्षण अभियान को संबल मिलेगा। वैद्य सुदर्शन चौमाल