
नई दिल्ली। जस्टिस आरएम लोढा, क्या आपने ये नाम सुना है? यदि आपके याद नहीं आ रहा तो चलिए हम आपको बता देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के ये पूर्व चीफ जस्टिस ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में चल रहे क्रिकेट सुधारों के जनक हैं। जस्टिस लोढा की अध्यक्षता वाली समिति ने ही बीसीसीआई की कार्यप्रणाली सुधारने के लिए लंबी-चौड़ी सिफारिशें पेश की थीं, जिसके चलते बोर्ड की राजनीति के कई दिग्गजों को अपने पद छोडऩे केे लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन जस्टिस लोढा बीसीसीआई में सभी सिफारिशों के अभी तक लागू नहीं हो पाने को लेकर बेहद निराश हैं।
एक इंटरव्यू में जताई निराशा
जस्टिस लोढा ने अपनी ये निराशा हिन्दुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में जाहिर की है। बीसीसीआई में सुधार की सिफारिशें लागू करने के फैसले को लगभग डेढ़ साल बीत जाने पर भी इसके लागू नहीं हो पाने को लेकर जस्टिस लोढा ने कहा, मैं बेहद निराश हूं, खासतौर पर जबकि सुप्रीम कोर्ट ने बेहद स्पष्ट निर्णय दिया था। बीसीसीआई की रिव्यू पिटिशन खारिज हो चुकी है और क्यूरेटिव पिटिशन भी खारिज की जा चुकी है। इसमें छिपाने की कोई गुंजाइश ही नहीं है, लेकिन इस पर कार्रवाई बेहद निराशाजनक है।
जस्टिस ठाकुर का रिटायरमेंट नहीं जिम्मेदार
जस्टिस लोढा ने सिफारिशों पर निर्णय देने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश टीएस ठाकुर के रिटायरमेंट को इस कार्रवाई में धीमेपन के लिए जिम्मेदार होने की बात पूछे जाने पर कहा, आप कह सकते हैं कि जब वे थे तो चीजें बहुत तेजी से चल रही थीं। लेकिन ये भी कहना चाहूंगा कि कानून लागू करना किसी एक पर निजी तौर से निर्भर नहीं होता। न्यायपालिका एक संस्था है और किसी एक पर निजी रूप से निर्भर नहीं हैं। चीजें आगे बढ़ती रहती हैं।
आईसीसी कर सकती है तो बीसीसीआई क्यों नहीं
अपनी सिफारिशों को बेहद व्यवहारिक मानते हुए जस्टिस लोढा ने कहा, हमनें बीसीसीआई और उससे जुड़े संघों को चलाने वाले कानून का अध्ययन किया था और इसके बाद निष्कर्ष पर पहुंचे थे। मजे की बात ये है कि इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ने हाल ही में अपने ढांचे को बहुत हद तक उसी तरह से बदला है, जैसा हम बीसीसीआई में लागू करना चाहते थे। आईसीसी ने एक महिला प्रतिनिधि तैनात किया है, वन मेंबर-वन वोट पॉलिसी आदि लागू किया है। जब इंटरनेशनल बॉडी ऐसा कर सकती है तो बीसीसीआई क्यों नहीं?