रजपुरा क्षेत्र का सिलापरी गांव की मानसून में तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। इलाका जंगली और पहाड़ी होने से यहां हिल स्टेशन जैसी खूबसूरती बिखर जाती है। और इसमें चार चांद लगाते हैं यहां के प्राकृतिक स्थल। यहां से बराना नदी और नसेनया नाला गुजरता है
दमोह. बारिश का मौसम कई परिवर्तन लेकर आता है। ये परिवर्तन प्रकृति के नजरिए से काफी महत्वपूर्ण होते हैं। भीषण गर्मी से सख्त पड़ी जमीन का स्वभाव बारिश से तृप्त होकर कोमल हो गया है। मैदानों ने घास की हरी चादर ओढ़ ली है। नदी, नाले, तालाब आदि में पानी हिलोरें मारने लगा है, मानों ये वर्षा का स्वागत कर रहे हों। इसी तरह उन झरनों में भी जान आ गई है, जो महीनों से सिर्फ सूरज की तेज तपिश बर्दाश्त करते आ रहे हैं। जिले में भी प्रकृति के ये सब परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण जिले के झरने हैं। बारिश से इनमें नई जान आ चुकी है। जिले में करीब एक दर्जन झरने हैं। खास बात ये है कि सभी झरने जंगली एरिया में है। चारों ओर जंगल की हरियाली और बीचोंबीच ऊंची ऊंची चट्टानों से नीचे गिरतीं जलधाराओं से कमाल के नजारे बनते हैं। जो बेहद रमणीय और आकर्षक होते हैं। ध्यान देने वाली बात ये है कि जंगलों में स्थिति ज्यादातर झरनों तक पहुंचने के लिए रास्ते सही नहीं है। इससे लोगों को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यदि प्रशासन इस ओर ध्यान दें, तो न सिर्फ सहूलियत होगी, बल्कि इससे सैलानियों की संख्या भी इजाफा होगा। हालांकि खराब रास्तों के बावजूद बारिश के मौसम में झरनों को देखने के लिए सैलानियों का तांता लगा रहता है। मजेदार बात ये है कि जिले में कुछ झरने ऐसे हैं जहां बड़े धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं। जिनकी खास मान्यताएं हैं। ऐसे में लोग परिवार सहित इन स्थानों पर पहुंचते हैं।
सिलापरी में बिखर जाती है हिल स्टेशन जैसी खूबसूरती
रजपुरा क्षेत्र का सिलापरी गांव की मानसून में तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। इलाका जंगली और पहाड़ी होने से यहां हिल स्टेशन जैसी खूबसूरती बिखर जाती है। और इसमें चार चांद लगाते हैं यहां के प्राकृतिक स्थल। यहां से बराना नदी और नसेनया नाला गुजरता है। बारिश से नदी में जलस्तर बढऩे लगा है। पहाडिय़ों से एकत्र पानी नसेनया नाला से होते हुए 40 फीट नीचे गिरकर वाटरफॉल में बदल जाता है। इस बीच चौतरफा जंगल की हरियाली होती है। सिलापरी में ये खूबसूरत नजारे देखते ही बनते हैं
जिले के अन्य प्रमुख वाटरफॉल
1- जोगन कुंड
यह एक धार्मिक स्थल है। जिसकी जबेरा से करीब 7 किमी दूर है। जोगन कुंड से करीब 3 किमी की दूरी पर जंगल के बीच में वाटरफॉल है। इसका पानी पहाडिय़ों से 160 फीट की ऊंचाई से गिरता है। नीचे गिरते ही पानी सफेद धुएं जैसा दिखने लगता है।
2- गोमुखधाम
यह सिद्ध क्षेत्र मडिय़ादो से पश्चिम की ओर 2 किमी दूरी पर है। इस क्षेत्र की पहचान धार्मिक स्थल से तो है ही। साथ में यहां से बहने वाले झरने, नाले भी कम आकर्षक नहीं है। यहां का वाटरफॉल सैलानियों का आकर्षण का केंद्र बनता है। लोग पिकनिक मनाने भी आते हैं।
3- घाटपिपरिया
ये वाटरफॉल दमोह से 40 किमी दूर कटनी रोड पर घाटपिपरिया गांव के पास है। इसे इसी गांव के नाम से जाना जाता है। जंगल में स्थित झरने की जल धारा पर्वतीय श्रृंखला से होकर नीचे गिरती है। यह अद्भुत नजारा देखते ही बनता है।
4 - निदानकुंड
ये जिले का सबसे बड़ा वाटरफॉल है। सिंग्रामपुर से यह 8 किमी दूर है। वाटरफॉल 168 फीट ऊंची लाइम स्टोन की चट्टानों से गिरने वाली दूधिया जलधारा है। इस अनुपम दृश्य को देखने जिले के अलावा जबलपुर, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर आदि से भी सैलानी आते हैं।
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अब कैसे पहुंचे समय पर जब कंडम हुईं १०० डायल वाहन सेवा
१०० डायल सेवा वाहन में पुलिसिंग कर रहे, कर्मियों को हर वक्त रहता है खतरा
दमोह. सरकार बेहतर पुलिसिंग पर जोर दे रही है, लेकिन जिले में कई वजहों से बेहतर पुलिसिंग की मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। इसमें प्रमुख वजह साधन के माध्यम यानी पुलिस अमले के वाहन बन रहे हैं। दरअसलए जिले के थानों और चौकियों में कई वाहनों की हालत खस्ता हो चुकी है। ऐसे वाहनों को अलग करने की बजाए जबरदस्ती इन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। जिससे पुलिस को परेशानी करने के साथ साथ आम जनता भी परेशान हो रही है। सबसे खराब हालत डायल 100 सेवा में लगे एफआरबी वाहनों की है। जिले में इन वाहनों की संख्या थानों के हिसाब से करीब डेढ़ दर्जन हैं। वहीं जानकर हैरानी होगी कि आधे से ज्यादा डायल 100 के वाहन कंडम हो चुके हैं। कंडम वाहनों के चलते पुलिस की रफ्तार पर ब्रेक लग रहा है। जबकि डायल 100 वाहन चलाने का मुख्य उद्देश्य पीडि़तों तक जल्दी से जल्दी पुलिस की सहायता पहुंचाना हैए लेकिन वाहनों की हालत खराब होने से बड़ी दिक्कतें हो रही हैं। जहां पुलिस को 10 से 15 मिनट में पहुंचना चाहिए, वहां डायल 100 के कंडम वाहनों से पुलिस को पहुंचने में दोगुना या इससे अधिक समय लग रहा है। वहीं कंडम वाहनों में सफर करने वाले पुलिस कर्मियों की जान को भी लगातार खतरा बना हुआ है। क्योंकि कंडम वाहनों के कारण हरदम हादसों की स्थिति बनी रहती है। इधरए डायल 100 सेवा में लगे एफआरबी वाहनों के अलावा थानों और पुलिस चौकियों में लगे कई अन्य वाहन भी खराब हालत से गुजर रहे हैं। कुछ पुलिस चौकियों में दो दशक पुराने वाहन आज भी लगे हुए हैं। जो आए दिन खराब होकर खड़े हो रहे हैं। साथ ही हादसों का खतरा भी बना हुआ है। वैसे भी विगत वर्षों के दौरान दशकों पुराने वाहनों से कई पुलिस कर्मी हादसों का शिकार हो चुके हैं। हालांकि इन घटनाओं के बावजूद आला अधिकारियों ने पुलिस महकमें से दशकों पुराने कंडम वाहनों को हटाने की पहल नहीं की है।