मुसाफिरों का खींच रहे ध्यान
युसूफ पठान मडिय़ादो. चकवा-चकवी के नाम से मशहूर चक्रवाक पक्षी सुनार नदी के कटन घाट पर अपना ठिकाना बना कर रहे हैं। यहां दो जोड़ा अक्सर दिखाई दे जाता हैं। जानकारों की मानें तो लद्दाख में पाए जाने वाला यह पक्षी जून-जुलाई में प्रजनन करता है। अक्टूबर माह तक प्रवासी पक्षी बन कर देश में कम ठंड होने वाले क्षेत्रों में आ जाता हैं। जानकारों की मानें तो यह प्रवास पर आए पक्षियों में पहला पक्षी होता हैं। इसके बाद विभिन्न प्रकार के पक्षी यहां आ जाते हैं।
इन दिनों सुनार नदी मेें विभिन्न स्थानों पर चक्रवाक पक्षी दर्जनों की संख्या में सुबह-शाम नदी किनारे धूप सेंकते या फिर नदी में जलीय वनस्पति घास-पूस को अपना भोजन बनाते दिखाई दे जाएंगे। चकवा-चकवी कबीर कहते हैं, सांझ पड़े, बीतबै, चकवी दीन्ही रोय। चल चकवा व देश को जहां रैन नहिं होय। चकवी की विशेषता है, सूरज उगने से शाम को सूरज ढलने तक यह जोड़े में रहता है। सूर्यास्त होते ही यह अलग-अलग हो जाते हैं।
रामसेवक तंतुवाय का कहना है तिंदनी गांव में नदी के पास खेती करने एक साल से रुका है। यहां बहुत बड़ी संख्या में चकवा-चकवी पक्षी रहा करते थे, लेकिन सूरज ढलने के बाद आधे पक्षी उस पार तो आधे इस पर आ जाते थे। रात्रि में कई बार अपने साथी को आवाज निकाल कर उस साथी के सकुशल होने का संकेत लेते रहते थे। कई लोग और भी ऐसे हैं, जिनके द्वारा चकवा-चकवी के जोड़ों को सूर्यास्त के बाद अलग-अलग देखा है, जबकि दिन में यह साथ-साथ रहते हैं।