दमोह

राजनीति में टोपी का क्रेज अब भी बरकार

पहले सफेद, फिर काली, फिर लाल अब भगवा रंग चढ़ा सिर

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Apr 03, 2019
Slogans are being written on the cap

दमोह. देश में सिर पर टोपी सियासी मायनों में आजादी की लड़ाई में अहम रही है। जहां गांधी की सफेद टोपी ने अहिंसक आंदोलनों को चरम पर पहुंचाया। वहीं सुभाषचंद बोस की खाकी टोपी ने युद्ध लड़े हैं। जब आजादी मिली तो राष्ट्रीय पर्वों पर ध्वजारोहरण गांधी टोपी पहनकर होने लगा नेता इसे पहनने लगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक की काली टोपी का भी क्रेज बढ़ा। चुनावों के दौर में कांग्रेसी ही गांधी टोपी का उपयोग करते थे, इसके बाद सपा ने सिर पर लाल टोपी पहनी, लेकिन इन टोपियों का क्रेज सीमित रहा यह प्लेट टोपियां थीं। टोपियों पर स्लोगन की शुरूआत अन्ना हजारे आंदोलन के बाद शुरू हुई। जिसे इस बार के लोकसभा चुनाव में परवान भाजपा चढ़ा रही है। रविवार को देश भर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मैं हूं चौकीदार की टोपियां पहनकर अब भगवा रंग चढ़ा दिया है।
टोपी का महत्व वर्तमान में राजनीतिक गलियारों में नजर आने लगा है। टोपी जहां राजनीतिक रंग में रंगी नजर आ रही है, वहीं वर्तमान में सामाजिक कार्यक्रमों में भी टोपी का उपयोग हो रहा है, झूलेलाल महोत्सव के दौरान सिंधी समाज द्वारा भी ऐसी टोपी पहनी जा रही है। देश के पहाड़ी अंचलों में लोग गोल टोपी अपनी संस्कृति के अनुरूप पहनते हैं। बुंदेलखंड अंचल में जमींदारों द्वारा काली गोल टोपी पहनी जाती थी। बुजुर्गों द्वारा यह टोपियां लगातार पहनी जाती थीं, वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांधी टोपी पहनते थे। अब इसका क्रेज कम होता जा रहा है।
अन्ना हजारे आंदोलन से बढ़ा क्रेज
आप नेता चंद्रमोहन गुरु बताते हैं कि गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा 2011 में दिल्ली में जन लोकपाल अनशन शुरू किया। उस दौरान गांधी टोपी में स्लोगन लिखा गया और आंदोलनकारियों ने अपने सिर पर मैं हूं अन्ना लिखी टोपियां पहनी। इसके बाद इनके सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 आमआदमी पार्टी का गठन किया। अब मैं हूं आम आदमी व झाड़ू का मोनो सफेद टोपियों पर नजर आने लगा। जिससे टोपियों का क्रेज बढऩे लगा था। इस तरह की सभी टोपियां पार्टी कार्यालय से उपलब्ध कराई गईं थीं।
अब सिर चढ़ा भगवा रंग
भाजपा जिला उपाध्यक्ष आलोक गोस्वामी बताते हैं बताते हैं कि 12 जनवरी 2०१४ को विवेकानंद जयंती पर भगवा रंग की टोपी में मोदी फॉर पीएम लिखा हुआ था, जिसे देश के भाजपा कार्यकर्ताओं ने पहना था। इसके बाद 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी से संदर्भित स्लोगन लिखी टोपिया कॉफी प्रचलित हुईं थी। अब 2019 मैं हूं चौकीदार की टोपियां भाजपा कार्यकर्ता अपने सिर पर धारण कर रहे हैं। चाहे पीएम फॉर मोदी की टोपियां हो या मैं हूं चौकीदार सभी टोपियां पार्टी मुख्यालय से कार्यकर्ताओं को उपलब्ध कराई गई हैं।
हिंदू महासभा व आरएसएस में भी रहा क्रेज
आरएसएस से जुड़े दिनेश चौबे बताते है कि हिंदू महासभा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक के गठन के बाद ड्रेस कोड के साथ स्वयं सेवकों ने अपने सिर टोपी पहनी है, हालांकि इसका रंग काला है। जो अब भी आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा पथसंचलन के द्वारा पूरी गणवेश में काली टोपी का प्रयोग किया जाता है। यह टोपी गणवेश के साथ कार्यकर्ताओं को संघ कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।
कांग्रेस सेवादल के सिर पर गांधी टोपी
कांग्रेस सेवादल के जिलाध्यक्ष वीरेंद्र दबे बताते हैं कि सफेद ड्रेस के साथ कांग्रेस सेवादल के कार्यकर्ताओं के सिर गांधी टोपी ड्रेस कोड है। यह टोपी सेवादल के कार्यक्रमों व बैठकों में पहनी जाती है। इसके साथ बड़ी आमसभाओं के साथ संगठन के कार्यक्रमों में सेवादल के कार्यकर्ता व्यवस्थाओं को बनाने के दौरान टोपियां पहनते हैैं। सदस्यता ग्रहण के दौरान यह टोपी पार्टी द्वारा मुहैया कराई जाती है, इसके बाद कार्यकर्ताओं को स्वयं खरीदनी पड़ती है।
नियमित पहनते हैं गांधी टोपी
अन्ना आंदोलन के बाद गांधी वादी टोपी नियमित पहनने वाले एक मात्र पं. दिवाकर विजय करमरकर हैं। जो घर से निकलते ही टोपी अपने सिर पर धारण कहते हैं। वह बताते हैं कि अन्ना हजारे आंदोलन की दमोह की कमान उन्होंने संभाली थीं, तब उन्होंने मैं हूं अन्ना की टोपी पहनी थी, आंदोलन के बाद वह लगातार टोपी पहनने लगे अब सफेद गांधी टोपी उनकी पहचान बन गई है।
सपा की टोपी भी छाई राजनीति में
सपा से जुड़े यशवंत सिंह राजपूत सोनू बताते हैं कि गांधी सफेद टोपी को रंगीला बनाने का श्रेय सपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह को जाता है, जिन्होंने अपने सिर पर लाल रंग की टोपी पहनी थी। इसके बाद सपा के हर कार्यक्रम व चुनावों के दौरान इस तरह की टोपियों का उपयोग किया जाता है। यह टोपियां भी चुनावों के समय व कार्यक्रमों में पार्टी मुख्यालय द्वारा कार्यकर्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है।
1 रुपए से 300 रुपए है कीमत
टोपी के पहने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों से बात करने व ऑनलाइन टोपी निर्माताओं के माध्यम से पत्रिका ने बात की तो टोपियों की कीमत 1 रुपए से 300 रुपए तक की है। गुजरात के मैनीफैक्र के एजेंट विशाल, रीना ने बताया कि उनके यहां से एक लाख से अधिक टोपियों का आर्डर देने पर एक टोपी एक रुपए की पड़ती है। वहीं नेताओं के अनुसार दमोह शहर से लेकर भोपाल व दिल्ली के खादी आश्रम में बिकने वाली टोपी की कीमत 30 रुपए से शुरू होकर 300 रुपए तक की होती है। टेरीकाट की टोपी 30 से 90 रुपए के अंदर आती हैं, वहीं सूती टोपी में रेट का स्टैंडर्ड व साइज के हिसाब से कीमत बढ़ती जाती है।
टोपी लाइन के नाम से मशहूर है बाजार
वरिष्ठ नेता व इतिहास के जानकार पं. विद्यासागर पांडेय बताते हैं कि जब गांधी जी दमोह की यात्रा पर आए थे, उसके बाद गांधी टोपी का क्रेज बढ़ा था। पांडेय बताते हैं कि गांधी टोपी का अविष्कारक गांधी जी हैं, जिन्होंने 1907 से 1914 तक दक्षिण आफ्रीका में रंगभेद आंदोलन के खिलाफ महात्मा गांधी ने टोपी पहनी थी। इसके बाद भारत आकर इसका चलन बढ़ाया। आजादी के बाद केवल राष्ट्रीय पर्वों व खास नेताओं द्वारा ही टोपी पहनी जाती थी। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस मनाते समय और 26 जनवरी 1950 को देश के पहले गणतंत्र दिवस पर सैकड़ों लोगों ने टोपियां पहनी थीं। जिसका क्रेज दमोह में भी बढ़ा जिससे यहां खरीददारों की संख्या अधिक होने पर बाजार का नाम ही टोपी लाइन प्रचलित हो गया है, जो आज भी प्रचलित है। पुराने समय में गांधी टोपी बनाने के कई कारीगर एक लाइन से बैठते थे, गांधी चौक के पास इस लाइन को टोपी लाइन आज भी कहा जाता है।

Updated on:
02 Apr 2019 09:55 pm
Published on:
03 Apr 2019 07:07 am
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