pesticide sellers: मध्य प्रदेश के कृषि विभाग ने दतिया में कीटनाशक विक्रेताओं को दुकानों पर दवाओं की सूची और दुष्प्रभाव की जानकारी प्रदर्शित करने के निर्देश दिए हैं। प्रतिबंधित दवाएं मिलने पर लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्रवाई होगी।
pesticide sellers: दतिया जिले में कीटनाशक दवाओं के उपयोग को नियंत्रित करने और किसानों को सुरक्षित खेती के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से कृषि विभाग ने सख्त निर्देश जारी किए हैं। अब जिले के सभी कीटनाशक विक्रेताओं को अपनी दुकानों के बाहर कीटनाशकों से होने वाले दुष्प्रभाव की जानकारी और विक्रय की जाने वाली दवाओं की सूची चस्पा करनी होगी। इस निर्देश का पालन न करने वाले विक्रेताओं पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
कृषि विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी भी दुकान में प्रतिबंधित कीटनाशक दवाएं पाई गईं, तो संबंधित दुकानदार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस दौरान उसका लाइसेंस निरस्त करने की प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी। जिले में रबी और खरीफ फसलों सहित अन्य प्रकार की खेती के लिए 200 से अधिक कीटनाशक विक्रेताओं की दुकानें संचालित हो रही हैं। कृषि विभाग ने इन सभी विक्रेताओं को निर्देश दिए हैं कि वे प्रतिबंधित दवाओं का विक्रय न करें और किसानों को कीटनाशकों के उचित उपयोग के प्रति जागरूक करें।
कृषि विभाग का अमला अब मूंग की खेती में कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग को नियंत्रित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसके तहत न केवल दुकानों पर कीटनाशकों के दुष्प्रभाव वाले पंपलेट और सूचना पत्र लगाए जाएंगे, बल्कि किसानों को भी जागरूक किया जाएगा कि वे मूंग की फसल में अधिक कीटनाशकों का प्रयोग न करें।
कृषि विभाग के अधिकारी गांव-गांव जाकर किसानों को जैव विविधता बढ़ाने और एकीकृत कीट प्रबंधन के तरीकों की जानकारी देंगे। इस पहल के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती के लाभ बताए जाएंगे और उन्हें रासायनिक कीटनाशकों के सीमित उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। कृषि विभाग द्वारा जारी इस सख्त नीति के तहत अब किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इससे न केवल किसानों की सेहत सुरक्षित रहेगी, बल्कि फसलों की गुणवत्ता भी बनी रहेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसान फसलों को जल्दी पकाने के लिए कीटनाशकों और नींदानाशकों का अधिक उपयोग कर रहे हैं। इस कारण इन दवाओं के अंश फसल में शेष रह जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। वर्तमान में किसान अपनी फसल में औसतन 5-6 बार कीटनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। वहीं, हरी फसल को सुखाने के लिए प्रतिबंधित नींदानाशक दवाओं का भी उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया जनस्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही है और गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक कीटनाशक और नींदानाशक दवाओं के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इससे कई प्रकार की गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। साथ ही, सिंचाई में पानी की खपत बढ़ने से भूमिगत जलस्तर भी लगातार नीचे जा रहा है, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।
उपसंचालक कृषि एवं किसान कल्याण अधिकारी, दतिया के अनुसार, किसानों को कीटनाशकों के स्थान पर प्राकृतिक विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। किसानों को नीम तेल और गोमूत्र से तैयार कीटनाशक दवाओं का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है, ताकि खेती में रासायनिक दवाओं का सीमित और नियंत्रित उपयोग किया जा सके।