दतिया

ऐसी दिखती थीं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बरसों बाद एमपी के म्यूजियम में गुमनाम पड़ी मिली दुर्लभ तस्वीर

Rani Lakshmibai Rarest Painting : दशकों तक दतिया संग्रहालय के अभिलेखागार में पड़ा एक प्राचीन कागज़ पर बना, धुंधला पड़ता शाही चित्र, जिसकी सोने की धूल रोशनी में अब भी चमक रही है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि, ये कलाकृति झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का सबसे पुराना जीवित समकालीन चित्रण है।
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Rani Lakshmibai Rarest Painting
दतिया के म्यूजियम में मिली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की पेंटिंग (Photo Source- Input)

Datia Museum : इतिहास प्रेमियों के लिए रोमांच से भर देने वाली एक खबर मध्य प्रदेश के दतिया से सामने आई है। दरअसल, शहर में स्थित एक म्यूजियम के अभिलेखागार में सैकड़ों वर्षों से गुमनाम पड़ी एक पेंटिंग को लेकर इतिहास के जानकारों ने बेहद चौंकाने वाला और बड़ा दावा किया है। पेंटिंग को लेकर माना जा रहा है कि, ये झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की अब तक की सबसे पुरानी और समकालीन तस्वीर है। प्राचीन कागज पर बनी इस कलाकृति की खास बात ये है कि, इसमें इस्तेमाल की गई सोने की धूल आज भी रोशनी में चमचमा रही है।

बता दें कि, ये खोज ' ज्ञान भारतम अभियान ' के तहत किए जा रहे आर्काइवल काम के दौरान की गई है। मध्य प्रदेश के पुरातत्व आयुक्त मदनकुमार नागरगोजे, जो खुद दतिया कलेक्टर भी रहे हैं। उन्होंने मौजूदा कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े के साथ म्यूजियम की अल्पज्ञात मराठा पेंटिंग्स पर चर्चा की थी। इसके बाद, अभिलेखागार विशेषज्ञ और 'ज्ञान भारतम' मिशन के नोडल अधिकारी नीलेश लोखंडे, पुरातत्वविद् वसीम खान और दतिया संग्रहालय के उप-निदेशक पी.सी. महोबिया द्वारा उस अवशेष की गहन जांच की गई। इसी चर्चा के बाद पेंटिंग्स को संरक्षण कार्यक्रम के तहत लाने का प्रस्ताव रखा गया और इस अनमोल धरोहर की पहचान की गई।

दतिया राज्य संग्रहालय को 1986 में दान किए गए थे शाही दस्तावेज

रानी झांसी का 1853 का एक चित्र हाल ही में 'ज्ञान भारतम अभियान' के तहत चल रहे अभिलेखीय कार्य के दौरान सामने आया। दतिया के तत्कालीन सांसद महाराजा किशन सिंह जू देव ने 1986 में दतिया राज्य संग्रहालय के उद्घाटन के अवसर पर शाही दस्तावेज़ और चित्र दान किए थे। यह चित्र उन्हीं दान की गई वस्तुओं का एक हिस्सा बताया जा रहा है।

क्या दर्शाती है ये तस्वीर ?

पुरातत्व विभाग के एक वरिष्ठ सलाहकार का कहना है कि, किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की समकालीन पेंटिंग मिलना उस कालखंड को समझने के लिए मील का पत्थर साबित होता है। रानी लक्ष्मीबाई की ये तस्वीर उनके बेटे के गोद लेने के उत्सव को दर्शाती नजर आती है, जो इसे ऐतिहासिक रूप से और भी संवेदनशील और खास बनाता है।

तस्वीर के बारे में सब कुछ

स्थान: दतिया म्यूजियम आर्काइव्स
सामग्री: प्राचीन कागज और सोने की धूल
महत्व: रानी लक्ष्मीबाई की सबसे पुरानी समकालीन छवि
प्रसंग: रानी के बेटे के दत्तक ग्रहण का उत्सव
अभियान: ज्ञान भारतम अभियान के तहत खोज

इस पेंटिंग को सिर्फ एक कलाकृति के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि 1857 की क्रांति की नायिका के जीवन का एक जीवंत प्रमाण भी कहा जा रहा है। विभाग अब इसे संरक्षित कर आम जनता और शोधकर्ताओं के लिए प्रदर्शित करने की योजना पर काम कर रहा है।

कौन थीं रानी लक्ष्मीबाई ?

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में मणिकर्णिका तांबे के रूप में हुआ था। बचपन से वो साहसी और शस्त्र कला में निपुण मनु का विवाह 1842 में झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ था। इसके बाद उन्हें लक्ष्मीबाई के तौर पर जाना गया। अपने पुत्र के असमय निधन और 1853 में पति की मृत्यु के बाद उन्हें भीषण संकट का सामना करना पड़ा।

स्वतंत्रता संग्राम की नायिका के तौर पर खास पहचान

ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहोजी ने हड़प नीति के तहत उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया था। साथ ही, झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी थी। इस अन्याय के विरुद्ध रानी ने अत्यंत वीरता के साथ 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी' का उद्घोष किया, जिसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महान नायिका के रूप में उभारते हुए अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बना दिया। उनके शौर्य और वीरता को आज भी देश गर्व के साथ याद करता है।

Updated on:
21 May 2026 09:24 am
Published on:
21 May 2026 09:24 am