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Rajasthan Rail Nagri: 35 किमी/घंटे की रफ्तार से दौड़ी थी राजस्थान की पहली ट्रेन, जानें 152 साल में कितनी बदल गई तस्वीर?

Bandikui Railway History: रेल नगरी बांदीकुई का इतिहास आज 152 साल का पड़ाव पार कर चुका है। भाप के इंजनों की छुक-छुक के साथ शुरू हुआ सफर अब आधुनिक इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव तक पहुंच गया है।

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Apr 20, 2026
बांदीकुई स्टेशन के बाहर रखा भाप का इंजन। फोटो: पत्रिका

Rajasthan First Train 1874: बांदीकुई। रेल नगरी बांदीकुई का इतिहास आज 152 साल का पड़ाव पार कर चुका है। भाप के इंजनों की छुक-छुक के साथ शुरू हुआ सफर अब आधुनिक इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव तक पहुंच गया है। इस दौरान न केवल ट्रेनों की गति बढ़ी, बल्कि तकनीक, सुविधाओं और रेलवे ढांचे में भी व्यापक बदलाव हुआ हैं। दिल्ली, जयपुर व आगरा के बीच महत्वपूर्ण ट्रांजिट प्वाइंट होने के कारण जंक्शन ने अपनी अलग पहचान बनाई है।

जानकारी के अनुसार प्रदेश की पहली 20 अप्रेल 1874 को आगरा से बांदीकुई के बीच मीटर गेज पर संचालित हुई थी, जिसे बाद में दौसा तक भेजा गया। बाद में दिल्ली-जयपुर रेलमार्ग शुरू होने से देश का पहला मीटर गेज जंक्शन बना। समय के साथ रेलवे में व्यापक बदलाव होते गए। वर्ष 1994 में जयपुर-दिल्ली रेलमार्ग का आमान परिवर्तन एवं वर्ष 2021 में विद्युतीकरण हुआ। हालांकि इससे यहां से लोको शेड हटा दिया गया। इसी प्रकार वर्ष 2004 में बांदीकुई-आगरा रेलखंड का आमान परिवर्तन हुआ। इस तरह 1874 में बिछाया गया ऐतिहासिक ट्रैक बदल गया। इसके बाद विद्युतीकरण भी हो गया।

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अब 150. 51 किलोमीटर के इस मार्ग पर एक हजार 338 करोड़ रुपए की लागत से दोहरीकरण का कार्य प्रगति पर है, जिसे दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। शुरूआती दौर में जहां ट्रेनों की स्पीड 35-40 थी। अब जयपुर-दिल्ली रेलमार्ग पर अधिकतम 130 तक की स्पीड से ट्रेनें दौड़ रहीं है। इसे 160 किलोमीटर प्रति घण्टे करने की योजना है। इस पर वन्दे भारत जैसी सेमी स्पीड ट्रेनें गुजरती हुई दिखाई देती है। वहीं आगरा-बांदीकुई मार्ग पर अधिकतम स्पीड 110 है।

आर्कषण का केन्द्र ब्रिटिशकालीन घण्टी

एक समय था जब स्टेशन पर लगी ब्रिटिशकालीन घण्टी ही ट्रेनों टे्रनों के संचालन का मुख्य माध्यम थी। घण्टी बजाने की संख्या के हिसाब से रेलकर्मी संकेत समझते थे। वहीं आम यात्री भी ट्रेन के आगमन का अनुमान लगा लेते थे। अब इसकी जगह आधुनिक उद्घोषणा प्रणाली व डिजिटल तकनीकों ने ले ली है।

विरासत को संजोने की पहल

रेलवे की ऐतिहासिक विरासत को सहेजने की दिशा में भी कदम उठाया गया है। गोल्डन रॉक वर्कशॉप तिरुचिरापल्ली से 24 फरवरी 2026 को एक भाप का इंजन आया है। इसे स्टेशन के बाहर रखा गया है। अब इसके चारों ओर सौंदर्यीकरण कार्य पूरा होने के बाद प्रदर्शन किया जाएगा। जिससे नई पीढ़ी रेलवे के गौरवशाली अतीत से रूबरू हो सके।

25 करोड़ रुपए से बदली तस्वीर

अमृत भारत योजना के तहत 25 करोड़ रुपए से स्टेशन का पुनर्विकास अंतिम चरण में है। ब्रिटिशकालीन भवन को हटाकर आधुनिक सुविधाओं से युक्त नया भवन बनाया गया है। 12 मीटर चौड़ा फुटओवरब्रिज, एसी वेटिंग हॉल, आकर्षक पेंटिंग, दोपहिया व कार पार्किंग, सर्कुलेटिंग एरिया डवलपमेंट, लाईटिंग समेत अन्य सुविधाएं विकसित की गई है।

इस तरह हुआ बदलाव

1874: आगरा-बांदीकुई के बीच पहली ट्रेन
1994: दिल्ली-जयपुर मार्ग आमान परिवर्तन
2021: दिल्ली-जयपुर मार्ग का विद्युतीकरण
2004: बांदीकुई-आगरा मार्ग ब्रॉड गेज
2026: बांदीकुई-आगरा मार्ग दोहरीकरण का लक्ष्य

टॉपिक एक्सपर्ट

स्टीम इंजन में पानी की क्वालिटि का विशेष महत्व था। अंग्रेजों ने बांदीकुई से पानी के सैम्पल जांच के लिए लंदन भिजवाए थे। पास होने पर बांदीकुई में ट्रेन संचालन की योजना बनाई गई। बांदीकुई में पहली ट्रेन डब नामक इंजन से पहुंची थी।
-रामदयाल शर्मा, रिटायर्ड लाइब्रेरियन आयोजना विभाग

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