उत्तराखंड में रविवार को आस्था, परंपरा और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब पवित्र चार धाम यात्रा का शुभारंभ भव्य धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुआ।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने श्री गंगोत्री धाम पहुंचकर पूजा-अर्चना की और विधिवत मंदिर के कपाट खुलवाए। इसी के साथ हिमालय की गोद में बसे चार धामों की वार्षिक यात्रा का शुभारंभ हो गया। उधर, यमुनोत्री धाम के कपाट भी श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। दोनों धामों को रंग-बिरंगे फूलों से आकर्षक रूप से सजाया गया था। हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए थे।
पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल रहा। ढोल-दमाऊ, रानसिंघा और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा। गढ़वाल राइफल्स बैंड की शानदार प्रस्तुति ने समारोह को विशेष गरिमा प्रदान की। देवी-देवताओं के ग्रीष्मकालीन निवास में आगमन के अवसर पर यह दृश्य श्रद्धा और संस्कृति का अनुपम संगम बन गया।
श्रद्धालुओं, पुजारियों, साधु-संतों और प्रशासनिक अधिकारियों की बड़ी भागीदारी ने इस आयोजन को और भव्य बना दिया। जुलूसों और धार्मिक कार्यक्रमों में उमड़ी भीड़ ने उत्तराखंड की सामूहिक आस्था और एकता का संदेश दिया।
इसी बीच भगवान केदारनाथ की पंचमुखी उत्सव डोली भी उखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर से वैदिक मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत के बीच रवाना हुई। मुख्यमंत्री धामी ने डोली को हरी झंडी दिखाकर यात्रा का शुभारंभ किया। फूलों से सजे मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं ने भंडारे का आयोजन किया और जयकारों से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा।
करीब आठ क्विंटल फूलों से सजे परिसर में निकली यह डोली यात्रा परंपरा और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक बनी। गढ़वाल राइफल्स की सहभागिता ने धार्मिक आयोजन में सैन्य सम्मान और अनुशासन का अनोखा समावेश किया।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, डोली पहली रात्रि विश्राम फाटा में करेगी और सोमवार को गौरीकुंड के लिए प्रस्थान करेगी। 21 अप्रैल को भगवान केदारनाथ धाम पहुंचेंगे, जहां प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा।
केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल को सुबह 8 बजे वैदिक मंत्रोच्चार और पूर्ण विधि-विधान के साथ खोले जाएंगे, जबकि 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के कपाट भी श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगे।
देशभर से हजारों श्रद्धालुओं का उत्तराखंड पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि चार धाम यात्रा केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और सनातन आस्था का विराट उत्सव है।