करीब 28 केसों में राजीनामा हुआ। इसमें से एक केस ऐसा था, जो 80 साल की बुजुर्ग माता अपने बेटे से भरण-पोषण के लिए लगाई थी। इस मामले में न्यायधीश के समझाने पर मां को 3 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण के रूप में देने को तैयार हुआ।
धमतरी. जिला सत्र न्यायालय में नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया गया, जिसमें 28 केस में राजीनामा किया गया। आपसी समझौता के जरिए एक परिवार को टूटने से बचाया। लोक अदालत में ही पुर्नविवाह की रस्म अदा की गई।
शनिवार को जिला न्यायालय परिसर में आयोजित लोक अदालत लगाकर सुनवाई की गई। उल्लेखनीय है कि नेशनल लोक अदालत में पूरे देशभर में एक साथ में राजीनामा के केस लगते हैं। अदालत में उन केसस में राजीनामा किया जाता है, जो लोग राजीनामा करते हैं और वह न्यायालय में उपस्थित होते हैं। यहां बहुत से राजीनामा के केस में अपराधिक प्रकरण में भी सुनवाई हुई। लेकिन जो विशेष रहा वह न्यायालय प्रधान न्यायधीश कुटुंब न्यायालय के विनोद कुमार देवांगन न्यायधीश के न्यायालय में हुआ, जहां पर कई परिवार को बचाने के लिए उन्होंने अपनी पूरी मेहनत लगा दी।
दिनभर में करीब 28 केसों में राजीनामा हुआ। इसमें से एक केस ऐसा था, जो 80 साल की बुजुर्ग माता अपने बेटे से भरण-पोषण के लिए लगाई थी। इस मामले में न्यायधीश के समझाने पर मां को 3 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण के रूप में देने को तैयार हुआ। ऐसा ही एक अन्य मामले में सुनवाई हुई। बताया गया है कि डिंपल चंद्राकर और तेजेंद्र चंद्राकर की शादी 29 नवंबर 2011 को हुई थी। शादी के पश्चात डिंपल और तेजेंद्र चंद्राकर का एक बच्चा हुआ। डिंपल चंद्राकर ग्राम दोनर की निवासी है, जबकि तेजेंद्र चंद्राकर राजिम का निवासी है। अक्सर उनमें थोड़ी-थोड़ी बात में विवाद होता था। एक दिन यह विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि दोनों ने एक साथ नहीं रहने का फैसला कर लिया। डिंपल चंद्राकर वर्ष-2020 में अपने पति का घर छोड़कर वापस अपने मायके में बच्चे के साथ आ गई। यहीं से बच्चे के लिए कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। तेजेंद्र चंद्राकर ने बाल कल्याण समिति से अपने बच्चे को सुपुर्दनामा में ले लिया। इसके बाद डिंपल ने धमतरी न्यायालय में धारा 125 के तहत भरण पोषण के लिए मामला दर्ज करा दिया। इसके अलावा धारा 13 के तहत विवाह विच्छेद हिंदू अधिनियम भी मामला दर्ज करा दिया। इतना ही नहीं उसने धारा 27 के तहत शादी के समय दिए गए दहेज की वापसी के लिए भी केस लगाया। यह केस चलते हुए करीब ढाई साल हो गए थे और दोनों में इतना मनमुटाव हो गया था कि एक-दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते थे। इसी बीच मामला जब न्यायालय में आया तो उन्हें दोनों के वकील पार्वती वाधवानी और धनंजय तिवारी ने भी समझाया। आखिरकार इन दोनों की भी मेहनत रंग लाई। अधिवक्ता पार्वती वाधवानी का कहना था कि दो दिलों को जोड़ देने से अच्छी और कोई बात नहीं हो सकती। हमारा प्रयास सफल हुआ।
एक- दूसरे को पहनाया वरमाला
लोक अदालत में अधिवक्ता और न्यायधीश की समझाने की शैली से दोनों की समझ में यह बात आ गई कि परिवार टूटने से बच्चे का भविष्य बर्बाद हो सकता है, इसलिए दोनों ने अपने बीच जो विवाद था, उन्हें निपटाया और नेशनल लोक अदालत में पहली बार पुनर्विवाह किया। एक-दूसरे को न्यायधीश एवं वकीलों और पक्ष कार्य लोगों के समक्ष वरमाला पहनाई। एक-दूसरे को गुलदस्ता भेंट किए और मुंह मीठा कराया। इस पर न्यायालय परिसर तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। इस तरह से यह प्रकरण सुलझा।