
Dhar News : देशभर में शक्कर के बढ़ते दाम रसोई का बजट बिगाड़ रहे हैं, लेकिन मालवा-निमाड़ में इसकी जड़ें खेतों तक पहुंचती हैं। जिस नर्मदा पट्टी में कभी गन्ना प्रमुख नकदी फसल था, वहां अब यहां इसके खेत तेजी से गायब हो रहे हैं। बढ़ती लागत, सिंचाई संकट, मजदूरों की कमी, कटाई परिवहन की परेशानी और शुगर मिलों से भुगतान में देरी ने किसानों का खेती से मोहभंग कर दिया है। नतीजा, पिछले तीन साल में क्षेत्र में गन्ने का उत्पादन करीब 70 फीसदी तक घट गया है।
एक दशक पहले मध्य प्रदेश का धार, बड़वानी, खरगोन और खंडवा के कई गांवों में गन्ना खेतों की पहचान था। गांवों में गुड़ बनाने की चरखियां चलती थीं और किसानों को एकमुश्त आय मिलती थी। अब किसान गन्ने की जगह कपास, मिर्च, मक्का, गेहूं और चना जैसी कम अवधि की फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, जिनसे तीन-चार महीने में पैसा मिल जाता है। गन्ने में खेत पूरे साल बंधा रहता है, लेकिन मुनाफे की गारंटी नहीं है। मौसम की मार, सिंचाई का अभाव और बढ़ती खाद, मजदूरी व परिवहन लागत ने खेती का गणित बिगाड़ दिया है। मिलों से भुगतान में लेटलतीफी भी किसानों का आर्थिक बजट बिगाड़ती है।
मालवा-निमाड़ में गन्ने की पैदावार और मांग को देखते हुए इंदौर, धार, खरगोन और बड़वानी में 5 प्रमुख शुगर मिलें संचालित होती थीं। इनमें धार जिले की नर्मदा नगर स्थित रेवा शुगर मिल और बड़वानी जिले की ठीकरी तहसील के घटवा स्थित मेकलसुता और इंदौर जिले की बरलाई शुगर मिल बंद हो चुकी हैं
गन्ने की घटती लोकप्रियता का अंदाजा मौजूदा रकबे से लगाया जा सकता है। खरगोन में करीब 1172 हे क्टेयर, धार में 300 हे क्टेयर, बड़वानी में 203 हे क्टेयर और खंडवा में महज 5 हे क्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती हो रही है तो इंदौर जिले में भी रकबा नहीं रहा है, यानी चार प्रमुख जिलों में कुल रकबा करीब 1680 हेक्टेयर ही बचा है।
1-मौसम और सिंचाई: असामान्य बारिश तथा पर्याप्त सिंचाई साधनों का अभाव।
2-लंबी अवधि की फसल: पूरे साल खेत बंधा रहने से दूसरी फसल नहीं।
3-उचित भाव का अभाव: लागत की तुलना में गन्ने की कीमत कम होना।
4-कटाई की समस्या: मजदूरों की कमी से कटाई में समय-खर्च बढ़ना।
5-भुगतान में देरी: मिलों से समय पर भुगतान नहीं मिलने से किसानों की पूंजी अटकना।
किसानों का कहना है कि, केवल गन्ने का भाव बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। सिंचाई का विस्तार, समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्था जरूरी है। श कर का उत्पादन कैसे बढ़ेगा, यह सवाल अब सरकार के सामने भी है। वहीं मिल मालिक भी खरीदी से आपूर्ति तक सरकारी गारंटी चाहते हैं।